पेड़ भी हैं हमारे भाई!, जमशेदपुर में दिखा अनोखा रक्षाबंधन, आदिवासी महिलाओं ने पेड़ों की उतारी आरती और बांधा रक्षासूत्र
रक्षाबंधन के पावन पर्व पर जमशेदपुर के पोटका प्रखंड स्थित बाहरदाढ़ी गांव में पर्यावरण और प्रकृति प्रेम का एक अनूठा व प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला।


Jamshedpur: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर जमशेदपुर के पोटका प्रखंड स्थित बाहरदाढ़ी गांव में पर्यावरण और प्रकृति प्रेम का एक अनूठा व प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। गांव के स्थानीय आदिवासी महिला-पुरुषों ने जंगल पहुंचकर साल (सखुआ) के विशाल पेड़ों को रक्षासूत्र बांधकर उनकी आजीवन रक्षा करने का सामूहिक संकल्प लिया। ग्रामीणों ने पूरे विधि-विधान से पेड़ों पर तिलक लगाया, उनकी आरती उतारी और कलाई की तरह तनों पर पवित्र राखी बांधी। इस भावुक और अनूठी पहल ने समाज को प्रकृति संरक्षण का एक बड़ा संदेश दिया।
'पेड़ भी परिवार के सदस्य और भाई जैसे', ग्रामीणों का प्रकृति से अटूट नाता
ग्रामीणों का कहना है कि जल, जंगल और जमीन से उनका सदियों पुराना आत्मीय नाता है और ये पेड़ उनके परिवार के सदस्य व भाई के समान हैं। जिस तरह एक भाई अपनी बहन की हर विपत्ति में रक्षा करता है, ठीक उसी तरह ये पेड़ भी आंधी-तूफान, भीषण गर्मी और बरसात में इंसान और धरती की सुरक्षा करते हैं। पेड़ हमें जीवनदायिनी शुद्ध हवा देते हैं और पर्यावरण के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखते हैं। ग्रामीणों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे किसी भी कीमत पर जंगलों और पेड़ों की कटाई नहीं होने देंगे। पेड़ों के कटने से न केवल पर्यावरण असंतुलित होता है, बल्कि बेजुबान वन्यजीवों का प्राकृतिक आशियाना भी छिन जाता है।
वन विभाग ने सराहा ग्रामीणों का प्रयास, दिया पूर्ण सहयोग का भरोसा
इस विशेष आयोजन में वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी मौजूद रहे। वन कर्मियों ने ग्रामीणों के इस अनूठे प्रकृति प्रेम और जागरूकता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जब तक स्थानीय समुदाय आगे नहीं आएगा, तब तक जंगलों का पूर्ण संरक्षण संभव नहीं है। वन विभाग ने ग्रामीणों को जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा में हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया।
'जंगल बचेंगे तो हम बचेंगे', हर साल निभाई जाती है यह परंपरा
कार्यक्रम के दौरान स्थानीय भाजपा नेता उपेंद्र सरदार ने कहा कि बाहरदाढ़ी गांव में हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर पेड़ों को रक्षासूत्र बांधने की यह सुंदर परंपरा निभाई जाती है। ग्रामीणों का यह साफ और स्पष्ट संदेश है कि "जंगल बचेंगे तो हम बचेंगे।" इस आयोजन ने न केवल क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाई, बल्कि नई पीढ़ी को भी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनने की सीख दी।

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