गोड्डा का बायोडायवर्सिटी पार्क अब शिबू सोरेन के नाम से जाना जाएगा, हजारों लोगों ने अपने दिशोम गुरु को किया नमन
झारखंड आंदोलन के महानायक और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर गोड्डा ने उन्हें ऐतिहासिक श्रद्धांजलि दी। शहर के बायोडायवर्सिटी पार्क का नाम बदलकर अब 'दिशोम गुरु शिबू सोरेन बायोडायवर्सिटी पार्क' कर दिया गया है।

GODDA/JHARKHAND: झारखंड अलग राज्य के आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे, पूर्व मुख्यमंत्री और पद्म भूषण से सम्मानित 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर आज पूरा राज्य उन्हें नम आंखों से याद कर रहा है। इस भावुक मौके पर गोड्डा जिले में उनके सम्मान में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। शहर के प्रसिद्ध बायोडायवर्सिटी पार्क का नाम अब आधिकारिक तौर पर बदलकर 'दिशोम गुरु शिबू सोरेन बायोडायवर्सिटी पार्क' कर दिया गया है। इसी पार्क परिसर में आज उनकी एक भव्य प्रतिमा का भी अनावरण किया गया, जहां लोगों ने अपने सर्वमान्य नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
जनप्रतिनिधियों और आम लोगों ने किया संघर्षों को नमन
इस विशेष श्रद्धांजलि समारोह में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आम जनता शामिल हुई। वहां मौजूद हर शख्स की जुबान पर दिशोम गुरु के उस कड़े संघर्ष की कहानी थी, जो उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़ा था। शिबू सोरेन ने अपना पूरा जीवन आदिवासी और मूलवासी अधिकारों की लड़ाई लड़ने और अलग झारखंड राज्य के सपने को साकार करने में समर्पित कर दिया था। उनका वह त्याग और संघर्ष आज भी झारखंड की माटी और यहां की पहचान का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है।
नेमरा गांव से शुरू हुआ सफर और तीन बार बने मुख्यमंत्री
11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन को एक नई और आक्रामक दिशा दी थी। उनके कुशल नेतृत्व में वर्षों तक चले उस ऐतिहासिक आंदोलन का ही नतीजा था कि साल 2000 में अलग झारखंड राज्य का गठन हो सका। एक साधारण से गांव से निकलकर राज्य की राजनीति के शिखर तक पहुंचने वाले शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए। राज्य की राजनीति में दशकों तक उनका गहरा प्रभाव और उनकी अपार लोकप्रियता हमेशा कायम रही।
ऐतिहासिक योगदान के सच्चे सम्मान की पहल
गोड्डा में उनकी पहली पुण्यतिथि के अवसर पर बायोडायवर्सिटी पार्क का नया नामकरण और उनकी प्रतिमा की स्थापना को उनके उसी ऐतिहासिक योगदान के सच्चे सम्मान के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान लोगों ने नम आंखों और गर्व के साथ उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। वहां मौजूद लोगों का कहना था कि दिशोम गुरु भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन झारखंड के जर्रे-जर्रे में उनकी यादें, उनका मार्गदर्शन और उनके विचार हमेशा जिंदा रहेंगे।
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