'पहले जांच करो, फिर कार्रवाई..., 70% लोग भी गलत हों, तो भी सबको नहीं निकाल सकते' ; जानिए क्या हुआ कोर्ट रूम में
झारखंड में 11वीं से 13वीं जेपीएससी (JPSC) और फूड सेफ्टी ऑफिसर की परीक्षा रद्द होने के बाद अपनी नौकरी गंवा चुके सैकड़ों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है।

Jharkhand High Court: झारखंड में 11वीं से 13वीं जेपीएससी (JPSC) और फूड सेफ्टी ऑफिसर की परीक्षा रद्द होने के बाद अपनी नौकरी गंवा चुके सैकड़ों युवाओं के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसके तहत इन नवनियुक्त अफसरों को अचानक नौकरी से निकाल दिया गया था। अदालत ने सरकार के इस कड़े कदम को 'प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस' यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन माना है। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब नौकरी से हटाए गए सभी कर्मियों को वापस उनके काम पर बुलाया जाएगा।
कोर्ट की कड़ी फटकार, 'बिना जांच के कैसे निकाल दिया?'
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार को सबसे पहले इस पूरे मामले की ठीक से जांच करनी चाहिए थी। बिना किसी ठोस जांच के अचानक नौकरी कर रहे लोगों को हटाने का फरमान जारी कर देना पूरी तरह से गलत है। अदालत ने कोर्ट रूम में साफ कहा कि अगर जेपीएससी की परीक्षा पास करके आए लोगों में से सत्तर प्रतिशत लोग भी गलत तरीके से भर्ती हुए हैं, तब भी सरकार इस तरह से एक झटके में बिना जांच के सबको बाहर नहीं निकाल सकती। सरकार को पहले जांच करनी चाहिए और जो लोग वास्तव में दोषी पाए जाएं, सिर्फ उन्हीं पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का होगा गठन, लेटर भेजकर काम पर बुलाए जाएंगे अफसर
इस गंभीर मामले को जल्द से जल्द सुलझाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए हाईकोर्ट ने एक फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का भी निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने सभी उपायुक्तों (डीसी) को यह कड़ा आदेश दिया है कि वे उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को तुरंत आधिकारिक लेटर जारी करें, जिन्हें सरकार के आदेश के बाद नौकरी से हटा दिया गया था। इस लेटर के जरिए उन सभी को सम्मान के साथ दोबारा काम पर वापस बुलाया जाएगा। इसके अलावा कोर्ट ने राज्य सरकार से इस पूरे मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई पंद्रह सितंबर को होगी।
पुरानी नौकरी छोड़कर आए थे युवा, सोनम की कहानी ने बयां किया दर्द
अदालत में यह पूरा मामला सौरभ सिंह और डिप्टी कलेक्टर सोनम कुमारी की ओर से दायर याचिका के बाद पहुंचा था। हजारीबाग में तैनात सोनम कुमारी की कहानी इस पूरे विवाद के मानवीय दर्द को बयां करती है। सोनम ने ग्यारहवीं से तेरहवीं जेपीएससी परीक्षा पास करने के बाद बिहार के गया जिले में अपनी पक्की सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़ दी थी। उन्हें पच्चीस नवंबर को नियुक्ति पत्र मिला था और वे पूरी मेहनत से अपनी ड्यूटी कर रही थीं। लेकिन सरकार के अचानक लिए गए फैसले ने उनकी दुनिया ही उजाड़ दी थी और उन्हें सड़क पर ला खड़ा किया था। प्रार्थी की ओर से यही दलील दी गई कि बिना गलती के उनका करियर क्यों बर्बाद किया जा रहा है।
रास्ते में ही रुक गई थी 200 उप समाहर्ताओं की ट्रेनिंग
सरकार के परीक्षा रद्द करने वाले फैसले का असर सीधे तौर पर उन दो सौ नवनियुक्त उप समाहर्ताओं (डिप्टी कलेक्टर) पर पड़ा था, जो दिन-रात अपनी ट्रेनिंग कर रहे थे। श्रीकृष्ण लोक प्रशासन प्रशिक्षण संस्थान से शुरुआती ट्रेनिंग के बाद इन सभी को अलग-अलग जिलों में प्रोबेशन पर भेजा गया था। हालात ये हो गए थे कि देवघर के बाबा धाम में विधि-व्यवस्था संभालने के लिए लगाए गए चालीस और दुमका के बासुकीनाथ में तैनात तेईस प्रोबेशन अधिकारियों को तकनीकी रूप से नौकरी खत्म होने के कारण बीच सावन में ही उनके पद से हटा दिया गया था। रातों-रात बेरोजगार हो चुके ये युवा भारी संशय में रांची पहुंचने लगे थे, लेकिन अब हाईकोर्ट के इस फैसले ने इनके चेहरों पर फिर से पुरानी मुस्कान लौटा दी है।

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