प्रधानमंत्री तो बने, लेकिन 15 अगस्त को लाल किले से नहीं दे पाए भाषण, जानिए कौन थे वो 2 PM
जानिए वे दो प्रधानमंत्री कौन थे, जो प्रधानमंत्री बनने के बावजूद 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित नहीं कर सके। गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर की पूरी कहानी।

New Delhi: हर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराना और देश को संबोधित करना प्रधानमंत्री की सबसे खास परंपराओं में शामिल है। 1947 से चली आ रही इस परंपरा को लगभग हर प्रधानमंत्री ने निभाया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे, जिन्हें 15 अगस्त के दिन लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करने का मौका ही नहीं मिला?
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हैं, तो यह दृश्य हर भारतीय के लिए बेहद खास होता है। यह परंपरा देश की आजादी के साथ ही शुरू हुई थी। 15 अगस्त 1947 को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया था और देश को संबोधित किया था।
इसके बाद लाल किले से प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस संबोधन देश की सबसे पहचान वाली परंपराओं में शामिल हो गया। हालांकि, आजादी के 79 वर्षों में दो प्रधानमंत्री ऐसे भी रहे, जिन्हें 15 अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करने का मौका नहीं मिला।
नेहरू ने शुरू की थी लाल किले से भाषण की परंपरा
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराकर स्वतंत्र भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस समारोह की शुरुआत की। इसके बाद हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करने की परंपरा आगे बढ़ती गई।
हालांकि, नेहरू का चर्चित भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ लाल किले से नहीं दिया गया था। यह ऐतिहासिक भाषण उन्होंने 14 और 15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात संविधान सभा में दिया था। इसके बाद 15 अगस्त के दिन लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन स्वतंत्रता दिवस समारोह की अहम परंपरा बन गया।
लेकिन इस परंपरा से दो प्रधानमंत्री ऐसे रहे, जो जुड़ नहीं सके।
गुलजारीलाल नंदा: दो बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन 15 अगस्त नहीं आया
इस सूची में पहला नाम गुलजारीलाल नंदा का है। वह दो बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने, लेकिन दोनों ही बार उनका कार्यकाल इतना छोटा रहा कि 15 अगस्त आने से पहले ही वह पद से हट गए।
जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद मई 1964 में गुलजारीलाल नंदा ने पहली बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री का पद संभाला। उनका यह कार्यकाल 9 जून 1964 तक चला। इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने।
लेकिन जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद नंदा को एक बार फिर कार्यवाहक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी मिली। उनका दूसरा कार्यकाल 24 जनवरी 1966 तक रहा। इसके बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं।
यानी नंदा दो बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन दोनों ही बार उनका कार्यकाल 15 अगस्त से पहले खत्म हो गया। इसी वजह से उन्हें कभी लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करने का मौका नहीं मिला।
चंद्रशेखर भी नहीं कर पाए लाल किले से राष्ट्र को संबोधित
दूसरा नाम चंद्रशेखर का है। वह 10 नवंबर 1990 को देश के प्रधानमंत्री बने। उस समय देश की राजनीति बेहद उथल-पुथल से गुजर रही थी।
चंद्रशेखर ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बनाई थी। हालांकि, यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। उन्होंने मार्च 1991 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उनकी सरकार कार्यवाहक सरकार के रूप में 21 जून 1991 तक काम करती रही।
जब 15 अगस्त 1991 आया, तब तक चंद्रशेखर प्रधानमंत्री पद पर नहीं थे। इस वजह से वह भी लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित नहीं कर सके।
क्यों खास है लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन?
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री का भाषण सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जाता। इसी मंच से प्रधानमंत्री देश की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं को जनता के सामने रखते हैं।
1947 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी कायम है। हर साल 15 अगस्त को पूरा देश प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए जाने वाले संबोधन का इंतजार करता है। लेकिन गुलजारीलाल नंदा और चंद्रशेखर के राजनीतिक जीवन में परिस्थितियां ऐसी रहीं कि प्रधानमंत्री बनने के बावजूद उन्हें इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनने का अवसर नहीं मिला।
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