अवैध खनन मामले में वन अफसरों पर FIR क्यों नहीं हुई, CJM कोर्ट ने हजारीबाग पुलिस से मांगा जवाब
हजारीबाग में वन नियमों को ताक पर रखकर अवैध खनन कराने और मामले में शामिल अफसरों को बचाने के विवाद पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है।
Hazaribagh: हजारीबाग में वन नियमों को ताक पर रखकर अवैध खनन कराने और मामले में शामिल अफसरों को बचाने के विवाद पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने तीन सितंबर को हजारीबाग सदर पुलिस को स्मरण पत्र भेजा है। अदालत ने पूछा है कि उसके पुराने आदेश पर अमल करते हुए वन विभाग के तत्कालीन अधिकारियों पर केस दर्ज किया गया या नहीं। अदालत ने दो टूक कहा है कि अगर अब तक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है तो पुलिस इसकी ठोस वजह साफ करे। मामले की अगली तारीख 28 सितंबर तय की गई है।
तत्कालीन अधिकारियों पर लगा था साठगांठ का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता मंटू सोनी ने हजारीबाग के तत्कालीन डीएफओ मौन प्रकाश और क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक आरएन मिश्रा समेत कई अधिकारियों के खिलाफ अदालत में परिवाद दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने 24 अप्रैल को ही पुलिस से एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी थी। पुलिस ने तय समय में जवाब नहीं दिया, जिसके बाद अदालत को यह रिमाइंडर जारी करना पड़ा।
सीआईडी जांच में पुष्टि के बावजूद दबा दी गई थी शिकायत
मामले की जड़ें हजारीबाग इलाके में अवैध खनन और फर्जी रिपोर्ट तैयार करने से जुड़ी हैं। आरोप है कि वन विभाग के तत्कालीन अधिकारी रवींद्र नाथ मिश्रा ने दोषियों पर पर्दा डालने के लिए गलत रिपोर्ट तैयार की थी। बाद में सीआईडी की जांच में भी इस गड़बड़ी की पुष्टि हुई थी। इस रिपोर्ट के आधार पर जब बड़ा बाजार टीओपी में केस दर्ज कराने की अर्जी दी गई, तब पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने की जगह उल्टा मुख्य आरोपी आरएन मिश्रा से ही जांच रिपोर्ट मांग ली। आरोपी अधिकारी ने अपने ही मातहत डीएफओ मौन प्रकाश से अपने बचाव में मनमाफिक रिपोर्ट तैयार कराई और पुलिस के हवाले कर दी।
बिना जांच के ही उच्चाधिकारियों को भेज दी गई थी एकतरफा रिपोर्ट
शिकायत में कहा गया है कि तत्कालीन सदर एसडीपीओ ने बिना किसी पड़ताल के उस मनगढ़ंत रिपोर्ट को उसी दिन जिले के एसपी को आगे बढ़ा दिया। सबसे बड़ा सवाल तब उठा जब बड़ा बाजार टीओपी प्रभारी यह तक नहीं बता पाए कि जांच के लिए वन विभाग को किस पत्रांक से चिट्ठी भेजी गई थी और किस पत्रांक से जवाब आया। किसी भी सरकारी रजिस्टर में इसका आधिकारिक ब्योरा दर्ज नहीं किया गया और बिना कोई औपचारिक मुकदमा लिखे पूरी प्रक्रिया निपटा दी गई।
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