अब किससे बात करेंगे आंदोलनकारी अभ्यर्थी?, मंत्री सुदिव्य सोनू के निधन के बाद हेमंत सरकार के सामने खड़ी हुई नई मुसीबत
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर आंदोलनरत अभ्यर्थियों के साथ सरकार के संवाद पर सवाल उठे हैं। परीक्षा सुधार, पारदर्शिता और छात्रों की लंबित मांगों को आगे बढ़ाने की चुनौती बढ़ गई है।

Sudivya Kumar Sonu Passes Away: झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के असामयिक निधन ने न केवल सत्ता के गलियारों को हिलाकर रख दिया है, बल्कि राज्य के लाखों प्रतियोगी छात्रों के भविष्य पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। सुदिव्य सोनू महज एक कैबिनेट मंत्री नहीं थे, बल्कि वे सरकार और आंदोलनरत अभ्यर्थियों के बीच संवाद का सबसे मजबूत और भरोसेमंद पुल बन चुके थे। जब राज्य में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) की भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली को लेकर लाखों युवा सड़कों पर उतरे थे, तब सुदिव्य सोनू ही वह शख्स थे जिन्होंने आगे आकर छात्रों और सरकार के बीच की खाई को पाटने की कमान संभाली थी।
25 दिनों के भारी गतिरोध के बाद खुद खोला था संवाद का रास्ता
रांची के ऐतिहासिक जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जब हजारों अभ्यर्थी अपनी मांगों को लेकर लगातार 25 दिनों तक धरने पर डटे रहे, तब शासन और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए थे। ऐसे नाजुक वक्त में 7 अगस्त को सरकार की ओर से सुदिव्य सोनू ने मोर्चा संभाला और आंदोलनकारी छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के साथ पहली औपचारिक बैठक की। उन्होंने छात्रों को आश्वस्त किया था कि सरकार उनकी सभी वाजिब चिंताओं और मांगों पर बेहद गंभीरता से काम करेगी। इसके अगले ही दिन 8 अगस्त को उन्होंने दूसरे छात्र संगठनों के साथ मैराथन बैठकें कीं और छात्रों से सीधे सुझाव मांगने के लिए ईमेल तक जारी करवाया, ताकि परीक्षा प्रणाली में जमीनी सुधार किए जा सकें।
14वीं JPSC को रद्द कराने में निभाई थी निर्णायक भूमिका
छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी मांग 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने के साथ-साथ धांधली की उच्चस्तरीय जांच की थी। सुदिव्य सोनू ने छात्रों के दर्द को सरकार के शीर्ष स्तर तक पहुंचाया, जिसके बाद ही सरकार 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा और बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने के लिए राजी हुई थी। साथ ही पूरी परीक्षा प्रणाली को फुलप्रूफ बनाने के लिए एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का ऐतिहासिक ऐलान किया गया था। हालांकि जेएसएससी सीजीएल (JSSC CGL) परीक्षा को रद्द करने और पूरे मामले की सीबीआई जांच जैसी मांगों पर सहमति नहीं बन पाई थी, फिर भी सुदिव्य सोनू लगातार छात्रों से संवाद बनाए रखने की पैरवी करते रहे।
युवाओं के गहरे अविश्वास को मिटाने की थी सबसे बड़ी चुनौती
उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री होने के नाते सुदिव्य सोनू सीधे उस आग के केंद्र में थे, जिसने पूरे झारखंड के नौजवानों को उबलने पर मजबूर कर दिया था। सरकार के सामने सिर्फ परीक्षा की तारीखें निकालना या फॉर्म भरवाना चुनौती नहीं थी, बल्कि राज्य की भर्ती एजेंसियों से युवाओं का पूरी तरह उठ चुका भरोसा वापस लौटाना सबसे बड़ा इम्तिहान था। सुदिव्य सोनू ने टकराव के बजाय सीधी बातचीत का रास्ता चुनकर इस तनाव को काफी हद तक कम करने का प्रयास किया था, जिससे दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट कम हुई थी।
सोनू दा के जाने के बाद अब आगे क्या?
सुदिव्य कुमार सोनू के अचानक निधन के बाद अब सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि उच्च शिक्षा और परीक्षा सुधार के इस संवेदनशील मिशन को अब आगे कौन बढ़ाएगा। जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में पारदर्शिता लाने के लिए जिस विशेषज्ञ समिति का खाका खींचा गया था, क्या वह रफ्तार पकड़ पाएगी? परीक्षा व्यवस्था में सुधार और सीबीआई जांच की मांग को लेकर छात्र आज भी गोलबंद हैं। ऐसे में सुदिव्य सोनू जैसे सुलझे हुए और बातचीत में माहिर नेता के चले जाने के बाद अब सरकार का नया संकटमोचक कौन होगा, इस पर पूरे राज्य के लाखों अभ्यर्थियों की निगाहें टिकी हैं।
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts

सुदिव्य कुमार सोनू के निधन पर रघुवर दास ने जताया दुख, बोले- राज्य के लिए बड़ी क्षति

रील बनाने पानी में उतरा छात्र, तेज बहाव में डूबा ; बचाने कूदा दोस्त भी नहीं बच सका







