झारखंड निर्माण के प्रणेता को मिला सम्मान, 'दिशोम गुरु' मरणोपरांत हुए पद्म भूषण से सम्मानित
झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और झारखंड आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले दिशोम गुरु को पद्म भूषण सम्मान से नवाजे जाने की घोषणा कर दी गई है. जो पूरे झारखंड के लिए गर्व का विषय है.

Dishom Guru: जेएमएम के संस्थापक और दिशोम गुरु के नाम से पूरे देश में प्रचलित, झारखंड निर्माण में अहम भूमिका निभा चुके भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को मरणोपरांत 'पद्म भूषण' सम्मान से नवाजा गया है. 2026 के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से इसकी आधिकारिक घोषणा की गई. शिबू सोरेन को जल-जंगल-जमीन का रक्षक और सामाजिक न्याय का प्रतीक माना जाता है.

'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन
दिशोम गुरु का अर्थ है ऐसा गुरु जो देश का मार्गदर्शक है. यह शब्द संथाली भाषा से लिया गया है. 'दिशोम' का मतलब होता है 'देश या समुदाय' और 'गुरु' मतलब 'नेता या मार्ग दिखाने वाला'. 1970 के दशक से उन्होंने आदिवासी समाज के लिए जो आंदोलन शुरू किया, उसके बाद उन्हें इस उपाधि से नवाजा गया. शिबू सोरेन ने ग्रामीणों के शोषण के खिलाफ ‘धान काटो’ आंदोलन शुरू किया. इसमें आदिवासी महिलाएं खेतों से धान काटती थीं, और पुरुष तीर-धनुष लेकर उनकी रक्षा करते थे. यह सिर्फ आंदोलन नहीं था, यह एक सामाजिक क्रांति थी जिसने आदिवासियों को एकजुट किया. उन्होंने सामूहिक खेती, सामूहिक शिक्षा और गांव-केंद्रित अर्थव्यवस्था का विचार रखा, जिससे ग्रामीणों में आत्मनिर्भरता की भावना आई.
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. उस समय महाजनी प्रथा और सूदखोरी अपने चरम पर थी. जब वह मात्र 13 वर्ष के थे, उनके पिता की हत्या महाजनों ने कर दी. इस घटना ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा तय कर दी. उन्होंने तय किया कि वह अपने समाज को इस शोषण से मुक्त कराएंगे.

1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नींव रखी. 1977 में उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा. लेकिन 1980 में दुमका से जीतकर लोकसभा पहुंचे और JMM के पहले सांसद बने. शिबू सोरेन ने झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना देखा और उसे हकीकत में बदला. 15 नवंबर 2000 को झारखंड भारत का 28वां राज्य बना.
शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, 2005, 2008 और 2009 में. इसके अलावा वे आठ बार लोकसभा सांसद और तीन बार केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी रहे. उनकी राजनीति का केंद्र बिंदु हमेशा आदिवासी समाज और झारखंड की अस्मिता रहा.
शिबू सोरेन ने आदिवासी युवाओं को यह समझाया कि अधिकार मांगने से नहीं, संघर्ष करने से मिलते हैं. उन्होंने अपने समाज को पढ़ाई, संगठन और नेतृत्व की राह दिखाई. उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति अगर ठान ले तो पूरे समाज की दिशा बदल सकता है.
सामाजिक न्याय और आदिवासी हक की लड़ाई
शिबू सोरेन न केवल एक राजनेता थे, बल्कि वे आदिवासी समाज के हक और सम्मान के प्रतीक भी थे. उन्होंने शोषण, विस्थापन और अन्याय के खिलाफ निरंतर संघर्ष किया. उनका जीवन संघर्ष, सादगी और जनसेवा का उदाहरण रहा. उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक आदिवासी मुद्दों को मजबूती से उठाया. शुरुआत में महाजनों के खिलाफ उनके संघर्ष को आज भी याद किया जाता है. इसके लिए उन्होंने जीवनभर लड़ाई लड़ी. उन्होंने अपने समाज से नशे का उखाड़ फेंकने का भी संकल्प लिया था.
बीते वर्ष कह दिया था दुनिया को अलविदा
बता दें कि 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने दुनिया को अलविदा कहा था. उनके निधन के बाद से ही उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न मिलने की कवायद तेज हो गई थी. गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्हें मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान देने की घोषणा की गई है.
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने ट्वीट कर शिबू सोरेन को मिल रहे इस सम्मान के लिए धन्यवाद दिया है.

वहीं रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ की ओर से भी प्रतिक्रिया दी गई है. उन्होंने एक्स हैंडल पर ट्वीट कर कहा कि "दिशोम गुरु श्रद्धेय शिबू सोरेन जी को पद्म भूषण सम्मान लोक कल्याण के लिए समर्पित उनके कार्यों का सम्मान है.

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