सरकार की पहल से बदल रही झारखंड के हजारों गरीब और आदिवासी बच्चों की कहानी
कभी जिन परिवारों के लिए डॉक्टर या इंजीनियर बनना एक नामुमकिन सपना माना जाता था, आज उन्हीं परिवारों के बच्चे JEE और NEET जैसी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं की तैयारी पूरे आत्मविश्वास और अनुशासन के साथ कर रहे हैं.

Ranchi: झारखंड के पहाड़, घने जंगल और दूर-दराज़ बसे वो गांव जहां दिन की शुरुआत सूरज से पहले मेहनत से होती है और जहां बचपन में खिलौनों से ज़्यादा कुदाल, दरांती और ईंट ढोने की तस्वीरें दिखाई देती हैं. इन्हीं गांवों में जन्म लेने वाले बच्चों के सपने अक्सर वहीं दम तोड़ देते हैं, जहां परिवार की आर्थिक सीमाएं शुरू हो जाती हैं. डॉक्टर, इंजीनियर ये शब्द यहां अक्सर सपनों की किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं. लेकिन अब झारखंड के हजारों गरीब और आदिवासी बच्चों की कहानी बदल रही है. रांची से शुरू हुई एक सरकारी पहल उन सपनों को ठिकाना, दिशा और उड़ान देने का काम कर रही है. जी हां...हम बात कर रहे हैं ''दिशोम गुरु शिबू सोरेन इंजीनियरिंग और मेडिकल कोचिंग संस्थान'' की. जहां हालात नहीं, अब हुनर बच्चों का भविष्य तय कर रहा है. देखिये ये खास रिपोर्ट...
झारखंड के दूर-दराज़ गांवों और पहाड़ी इलाकों से आए ये बच्चे किसी सपनों की दुनिया से नहीं, बल्कि संघर्ष की ज़मीन से निकलकर यहां पहुंचे हैं. किसी के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं, किसी की मां मनरेगा में ईंट और मिट्टी ढोती है, तो कोई ऐसा भी है जिसने बचपन से खेत और फसल की चिंता देखी है. कभी जिन परिवारों के लिए डॉक्टर या इंजीनियर बनना एक नामुमकिन सपना माना जाता था, आज उन्हीं परिवारों के बच्चे JEE और NEET जैसी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं की तैयारी पूरे आत्मविश्वास और अनुशासन के साथ कर रहे हैं. सरकार की इस पहल ने उन्हें सिर्फ कोचिंग नहीं दी, बल्कि उन्हें खुद पर भरोसा दिया, आगे बढ़ने का मौका दिया और उनके भविष्य की दिशा तय कर दी है.
यह कोचिंग सेंटर उन बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जिनके सपने कभी फीस की दीवार से टकराकर रुक जाया करते थे. यहां पढ़ाई के नाम पर एक रुपया भी नहीं लिया जाता. क्लासरूम की पढ़ाई से लेकर किताबें, नोट्स, मॉक टेस्ट, डाउट क्लियर सेशन, हॉस्टल, पौष्टिक भोजन और 24 घंटे खुली लाइब्रेरी तक हर ज़रूरत सरकार की ओर से पूरी की जा रही है, ताकि बच्चे सिर्फ अपने लक्ष्य पर फोकस कर सकें. यहां दाखिला किसी पहचान, सिफारिश या पहुंच के दम पर नहीं मिलता, बल्कि एक सख्त प्रवेश परीक्षा और मेरिट लिस्ट के आधार पर होता है. मतलब साफ है. यहां वहीं बच्चे पढ़ते हैं, जो मेहनत से अपनी किस्मत बदलने का हौसला रखते हैं.
यहां पढ़ाई किसी सामान्य कोचिंग की तरह नहीं, बल्कि देश के बड़े और नामी कोचिंग संस्थानों की कार्यप्रणाली पर कराई जा रही है. संस्थान में बच्चों को वही आधुनिक सिलेबस, वहीं रियल एग्जाम पैटर्न, नियमित मॉक टेस्ट और एक्सपर्ट टीचर्स की अकादमिक गाइडेंस दी जा रही है, ताकि वे किसी भी बड़े निजी कोचिंग हब के छात्रों से पीछे न रहें. इस पहल का मकसद बिल्कुल साफ है. झारखंड के गरीब और आदिवासी बच्चों को भी वहीं स्तर, अवसर और वहीं मंच मिले, जो बड़े शहरों के संपन्न परिवारों के बच्चों को मिलता है. इसी को लेकर अभिभावक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रति आभार जता रहे हैं और इसे बच्चों के भविष्य के लिए ऐतिहासिक पहल बता रहे हैं. 
आज रांची का यह संस्थान महज़ एक कोचिंग सेंटर नहीं, बल्कि झारखंड के गरीब और आदिवासी बच्चों के सपनों का सबसे भरोसेमंद ठिकाना बन चुका है. यहां पढ़ने वाले बच्चे अब सिर्फ अपनी किस्मत नहीं बदल रहे, बल्कि अपने गांव, अपने समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राह तैयार कर रहे हैं. सरकार की यह पहल यह संदेश दे रही है कि अगर नीयत साफ हो और सोच सही दिशा में हो, तो शिक्षा सबसे बड़ा हथियार बनकर पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती है...
रिपोर्ट- यशवंत कुमार
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