Ramzan 2026: आज पाक रमजान का 17वां दिन है. इस्लाम के लिहाज से ये एक अहम दिन है, क्योंकि दूसरी हिजरी को इसी दिन इस्लाम को बद्र के मैदान में पहली फतह मिली थी. जिसे गज़वा ए बद्र, जंग ए बद्र या बद्र की लड़ाई कहा जाता है. अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से ये जंग 13 मार्च सन् 624 में लड़ी गयी थी.
ये वो दौर था जब इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद लोगों को एकमात्र अल्लाह की इबादत करने का पैगाम देते थे. जिसकी वजह से मक्का के कुफ्फार ( गैर मुस्लिम या काफिर) उनकी जान के दुश्मन बन गए और 13 साल के बाद उन्हें हिजरत कर मक्का से मदीना आना पड़ा. इस दौरान उनके साथ कुछ सहाबी (अनुयायी) थे.
जंग ए बद्र का जो वाक़्या इस्लामी रिवायतों में आता है, उसके अनुसार मक्का के कुरैश कबीले के कुरैशियों का एक व्यापारिक कारवां (काफ़िला) उनके सरदार अबू सुफियान के नेतृत्व में सीरिया से मक्का लौट रहा था. यह एक बहुत ही समृद्ध कारवां था जिसमें करीब 50,000 सोने के दिनार जितनी संपत्तियां थीं और मक्का के ज्यादातर लोगों का कुछ न कुछ पैसा इस में लगा हुआ था. ये कारवां मदीना के पास से गुजरने वाला था.
पैगंबर मोहम्मद को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने इस कारवां को रोकने का फैसला किया और उन्होंने अपने सहाबों को कूच करने का हुक्म दिया. इस लश्कर (सेना) में सिर्फ 313 लोग, 2 घोड़े, 70 उंट और बहुत कम हथियार थे.
अबू सूफियान को ये अंदाजा था कि उसके काफिले को लूट का खतरा है. वो सतर्क हो गया और पूरे रास्ते में आने जाने वाले लोगों से पूछताछ करता रहा. एक जगह वह एक कुंए में रुका और वहां पर उंटों की लीद में खजूर की गुठलियों से पहचान गया कि ये मदीने के खजूर हैं. उसने तुरंत अपने एक दूत ज़मजम को मक्का भेजा और मदद के लिए सेना बुलाई. हालांकि इस बीच उसने रास्ता बदल लिया और समुंदर के किनारे जाने वाले लंबे रास्ते को चुना और अपने काफिले को बचा लिया.
इधर अबू सुफियान का संदेश पाकर मक्का से अम्र बिन हिशाम (जिसे इस्लाम में अबू जहल के नाम से जाना जाता है) के नेतृत्व में 1000 की सेना अपने काफिले को बचाने के लिए निकल पड़ी. जिसमें 300 घोड़े, 700 उंट और हथियारों से लैस सैनिक थे. हालांकि इस बीच अबू सूफियान अपने कारवां के साथ सुरक्षित मक्का पहुंच गया और उसने फिर संदेश भिजवाया कि वह वापस आ जाए, लेकिन अबू जहल ने कहा कि जब हम लोग बद्र तक आ चुके हैं तो बद्र में लगने वाले मेले में हिस्सा लेते हैं, मौज-मस्ती करते हैं, नाच गाना देखते हैं और कुरैश कबीले की शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. जिससे अरब के लोग यह समझें कि कुरैशी डरपोक नहीं हैं.
ग़ौरतलब है कि इस काफिले में शामिल कुछ कबीले जैसे बनू जहरा, बनू अदी और बनू काब के लोगों ने अबु जहल की बात नहीं मानी और वे वापस लौट गए. यानी कि सेना की संख्या घटकर 500 से 600 ही रह गई.
जंग की पूर्वसंध्या पर पैगंबर मुहम्मद उस जगह पर आये और कहा कि काफिरों की शिकस्त होगी और वे पीठ फेरकर भाग जाएंगे. फिर एक डंडा लेकर गोल दायरा बनाया तो किसी की समझ में कुछ नहीं आया. फिर सहाबों ने पूछा तब उन्होंने कहा कि इस जगह पर अबू जेहल मारा जाएगा. कुछ दूरी पर दूसरा दायरा खींचा और कहा कि उमय्या यहां मारा जाएगा. तीसरा दायरा खींचकर कहा सायबा यहां मारा जाएगा. चौथी लकीर खींच कर कहा कुत्बा यहां मारा जाएगा.
दुसरे दिन 17 रमजान को जब जंग शुरू हुई, तो कुरैश कबीले वालों की संख्या इनसे बहुत ज्यादा थी. साथ ही इसमें शामिल लोग किसी न किसी के करीबी रिश्तेदार भी थे. यहां तक की कोई किसी का बाप, भाई, चाचा तो कोई मामा था. तब पैगंबर ने अल्लाह से दुआ की कि या इलाही, अगर तूने इस छोटी सी जमात को हलाक(शहीद) कर दिया तो जमीन में तेरी इबादत करने वाला कोई नहीं रहेगा.
फिर जंग शुरू हुई और मुस्लिम सेना की ओर से उत्बा, शैबा और वलीद आए और कुरैशियों को ललकारा तो कुरैशियों ने कहा कि हमें मदीने वालों से नहीं बल्कि मक्का के मुहाजिरों (जिन्होंने मक्का से मदीना हिजरत की थी) से लड़ना है तो पैगंबर ने हजरत अली, हमजा और उबैदा को मैदाने जंग में आने का आदेश दिया. पलक झपकते ही इन लोगों ने कुरैश के तीनों योद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद दोनों तरफ के सैनिक एक दूसरे पर टूट पड़े. पैगंबर मोहम्मद ने कुछ कंकड़ियां फेंकी तो एक बवंडर उठा. सहाबियों ने पूछा कि रसूल अल्लाह ये क्या है? तो उन्होंने कहा कि ये फरिश्ते जिब्राईल और मिखाईल के नेतृत्व में फरिश्तों की सेना है, जो हमारी तरफ से लड़ने आई है. इस बीच एक कम उम्र का सहाबा अमीर बिन अल हमाम खजूर खाते हुए आया और पैगंबर से पूछा कि क्या मैं इस जंग में शहीद हुआ तो जन्नत चला जाउंगा, पैगंबर ने इसपर हामी भर दी. फिर उसने खजूर फेंका और तलवार लेकर जंग में कूद गया और शहीद हो गया. अंसारी मुआज ने अबू जहल को मार दिया. इस तरह मुसलमानों की जीत हुई और कुरैशी बुरी तरह हार गए.
इस जंग में 70 कुफ्फार मारे गए और इतने ही घायल हुए, कुछ को बंदी बना लिया गया तो कुछ जान बचाकर भाग गए.
अल्लाह के रसूल की तरफ से जंग लड़ने वाले कुल 14 मुसलमान जिसमें 6 मुहाजिर जो (मक्का से हिजरत कर के आए थे) और 8 अंसारी (जो मदीना से थे), शहीद हुए.
जंग के बाद सभी कैदियों को फिदिया (जमानत ) लेकर छोड़ दिया गया. इसमें एक कैदी अबुल आस भी थे जो पैगम्बर के दामाद थे. उनकी शादी पैगम्बर की बेटी ज़ैनब से हुई थी. ( प्रेमचंद की कहानी नबी का नीति निर्वाह में इस वाक़िए का पूरा ज़िक्र है)
ये था जंग ए बद्र का वाकिया जिसे इस्लाम की पहली जीत माना जाता है. कुरान मजीद की सूरा अल अनफाल के अलावा इस्लामी इतिहासकार इब्न कशीर, इब्न इसहाक, तबरी, सैफुर्रहमान मुबारकपुरी और विलियम मुईर ने अपनी रिवायतों में इसका ज़िक्र पूरे विस्तार से किया है.








