सत्यव्रत किरण
रांची में गैस की किल्लत ने लोगों को इतना “क्रिएटिव” बना दिया है कि अब परेशानी भी आराम से काटी जा रही है- बस 200 रुपये खर्च करिए और चैन की नींद सो जाइए। खासकर चुटिया के बेल बागान इलाके में यह नज़ारा साफ देखने को मिल रहा है। अब आपको रात 2 बजे उठकर ठंड में लाइन लगाने की कोई जरूरत नहीं है। आपका काम आपका खाली गैस सिलेंडर और उसकी “रखवाली” करने वाला व्यक्ति कर देगा। दरअसल, बेल बागान के आसपास रहने वाले कुछ स्थानीय लोगों ने इसे बाकायदा एक “रखवाली योजना” का रूप दे दिया है। ये लोग रात भर लाइन में लगे सिलेंडरों की निगरानी करते हैं और उनकी जगह सुरक्षित रखते हैं। बदले में हर सिलेंडर पर 200 रुपये तय है। यानी आप पैसे दीजिए और बाकी जिम्मेदारी इन “रात के रखवालों” पर छोड़ दीजिए।
सीधा हिसाब है—200 रुपये दीजिए, सिलेंडर लाइन में लगाइए और फिर घर जाकर चादर ओढ़कर आराम से सो जाइए। आपका सिलेंडर रात भर जागेगा, ठंड सहेगा, लाइन में आगे बढ़ेगा… और सुबह आप ताजगी के साथ आकर गैस ले लीजिए। यानी अब घर का सबसे जिम्मेदार सदस्य इंसान नहीं, बल्कि गैस सिलेंडर बन गया है।
ये सिर्फ सुविधा नहीं, एक “कमाई का फॉर्मूला” भी बन चुका है। सोचिए, अगर किसी ने 50 सिलेंडर का भी जिम्मा ले लिया, तो एक रात में सीधे 10,000 रुपये जेब में। बिना डिग्री, बिना इंटरव्यू, बिना किसी सरकारी योजना—सीधे कैश इन हैंड। अब इससे आसान और तेज कमाई का जरिया शायद ही कहीं मिले।
सवाल यही है कि जहां सिस्टम को लोगों को सुविधा देनी थी, वहां लोगों ने खुद ही सुविधा खरीदनी शुरू कर दी। गैस की गाड़ी समय पर नहीं पहुंचती, तो कोई बात नहीं… “रखवाली सेवा” समय पर मिल रही है। प्रशासन की कमी अब “लोकल सर्विस” से पूरी हो रही है।
गुस्सा इस बात पर भी आता है कि यह सब अब सामान्य होता जा रहा है। लोग मजाक में कहते हैं—“भाई, 200 रुपये दे दो और टेंशन खत्म।” यानी अब गैस मिलना नहीं, लाइन में जगह मिलना बड़ी बात हो गई है।
कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं कि रांची में गैस लेना अब मेहनत का नहीं, मैनेजमेंट का खेल बन गया है—पैसा दो, आराम करो और सुबह गैस लेकर लौट आओ। सिस्टम चाहे सो रहा हो, लेकिन आपका सिलेंडर पूरी रात “ड्यूटी” पर तैनात है।









