Ranchi के बाजार में आ गई बेशकीमती सब्जी, स्वाद में नॉनवेज भी फेल...कीमत सुन उड़ेंगे आपके होश
देशी मटन रूगड़ा रांची के बाजार में आ गया है, अगर आप रांचीवासी हैं और आपको यह सब्जी बेहद पसंद है तो आपके लिए खुशखबरी है. यह सब्जी आपको बाजार में आपको 1600 से 2000 रुपए किलो के हिसाब से मिलेगी.

Most Expensive Vegetable (Report By- Rajesh Kumar): झारखंड में आपको तरह-तरह की फल और सब्जियां मिलेंगी. जिसका आने का अपना-अपना सीजन होता है. लेकिन आज हम आपको झारखंड में मिलने वाली एक ऐसी सब्जी के बारे बताने जा रहे हैं जो दिखने में एकदम साधारण सा लगता है लेकिन उसके दाम सुनते ही आपको होश उड़ जाएंगे. मगर फिर भी लोगों में इस सब्जी की मांगें कम नहीं होती. दरअसल, हम बात कर रहे हैं झारखंड और छत्तीसगढ़ में पाए जाने वाली एक ऐसी बेशकीमती सब्जी की, जो साल में सिर्फ एक बार ही मिलता है यह खाने में इतना लजीज होता है कि आप खाते-खाते आप अपनी उंगली भी चबा देंगे.
शाकाहारियों के लिए यह सब्जी मटन से कम नहीं होता. अबतक तो आप समझ ही गए होंगे... कि हम किस सब्जी की बात कर रहे हैं. तो आपको बता दें, हम देशी मटन यानी कि रूगड़ा (पुटू या पुटका) की बात कर रहे हैं. अगर आप रांचीवासी हैं और आपको यह सब्जी बेहद पसंद है तो आपके लिए खुशखबरी है. जी हां... क्योंकि देशी मटन रूगढ़ा रांची के बाजारों में आ चुका है. बाजार में अभी इसकी कीमत 1600 से 2000 रुपए किलो हैं.
रांची में RU के पास बेच रही महिला
रांची यूनिवर्सीट के पास एक महिला रूगड़ा बेच रही है जहां लोग इसे खरीदने के लिए पहुंच रहे हैं और 400 रुपए पाव के हिसाब से रुगड़ा खरीद रहे हैं. आपको बता दें, रूगड़ा अक्सर, मानसून के समय बाजारों में चढ़ता है लेकिन इस बार समय से पहले ही बाजार में दिखने लगा है. बातचीत में रुगड़ा बिक्री कर रही महिला ने बताया है बारिश की वजह से इस बार रूगड़ा जल्दी बाजार में चढ़ गया है. छत्तीसगढ़ से खरीदने के बाद वह रांची में 1600 से 2000 रुपए की कीमत से रूगड़ा बेच रही है.

क्या होता है रूगड़ा ?
रूगड़ा जिसे पुटू भी कहा जाता है यह झारखंड और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों के जंगलों में पाया जाता है. यह एक प्रकार का मशरुम है जो दिखने में गोल और थोड़े चपटे लेकिन खाने में स्वादिष्ट होता है. यह झारखंड और छत्तीसगढ़ की सबसे महंगी सब्जी है. मानूसन के पहुंचते ही लोग इस सब्जी का बेसब्री से इंतजार करते हैं.
रूगड़ा साल/सखुआ या सरई के जंगलों के बीच भुरभुरी मिट्टी में प्रकृतिक रुप से उत्पन्न होता है इसमें दाने नहीं होते है न ही कोई बीज. इस वजह इसकी खेती नहीं की जा सकती है. यह हर साल मानसून के समय सरई के जंगलों में उसके पत्ते और फलों के झड़ने के बाद उसके सड़ने से बने कवच से तैयार होते हैं.
यह बारिश और धूप के बीच उमस के कारण जमीन से बाहर निकलती है. और हल्की-हल्की बारिश की वजह से आसानी से लोगों को दिख जाती है. ग्रामीण इलाकों में महिलाएं लकड़ी की मदद से जमीन से इसे बाहर निकलती है. गांव की महिलाओं को जैसे ही इसकी खबर मिलती है कि जगंल में पुटू यानी रुगड़ा निकला शुरू हो गया है. वे सुबह सबेरे सबसे पहले उठकर रूगड़ा ढूंढने जंगल पहुंच जाती है.
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