झारग्राम में 10 रुपए की झालमुरही खाते नजर आए PM मोदी, सादगी या राजनीतिक स्टंट?
पश्चिम बंगाल के झारग्राम में प्रधानमंत्री एक झालमुरही की दुकान में जाकर दुकानदार से कुछ बात करते हैं और दस रुपए पकड़ाते हैं. दरअसल उन्होंने दस रुपए की झालमुरही ली थी. खैर, इस सादगी से भरे कृत्य को चुनावी स्टंट के तौर पर देखा जा रहा है.

West Bengal Election 2026: झारग्राम में नरेंद्र मोदी का झालमुरही खाते हुए “साधारण” अंदाज़ भले ही सुर्खियां बटोर रहा हो, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक मानवीय जुड़ाव के रूप में देखना अधूरा होगा. ऐसे दौरों के पीछे अक्सर एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी होती है. खासतौर पर तब, जब राज्य में चुनावी माहौल धीरे-धीरे गर्म हो रहा हो.
पिछले विस चुनाव की भरपाई करने के प्रयास में बीजेपी
जंगलमहल जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में इस तरह का जमीनी जुड़ाव दिखाना सीधे तौर पर West Bengal Assembly election की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है. 2021 के चुनावों में बीजेपी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, और उसके बाद से पार्टी लगातार राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ऐसे में प्रधानमंत्री का अचानक सड़क किनारे रुककर झालमुरही खाना सिर्फ सहजता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है “हम आपके बीच हैं.”
प्रतीकात्मक कदम आवश्यक या ठोस काम
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस तरह के प्रतीकात्मक कदमों से ज्यादा जरूरी है नीतिगत स्तर पर ठोस काम. उदाहरण के तौर पर, हाल ही में पारित महिला आरक्षण बिल को लेकर भी सवाल उठे हैं. केंद्र सरकार संसद में सीटें बढ़ाने के बाद 33 प्रतिशत आरक्षण के साथ महिला आरक्षण बिल पास कराना चाहती थी. जिसे विपक्ष द्वारा सहमति प्राप्त नहीं हो पायी. इसके पास न हो पाने के बाद प्रधानमंत्री ने इसी मुद्दे पर राष्ट्र को संबोधित कर डाला. बता दें कि अब तक कुल 80 बार देश के विभिन्न प्रधानमंत्रियों द्वारा राष्ट्र को संबोधित किया जा चुका है, लेकिन पार्टी आधारित आलोचना करने के उद्देश्य से यह पहली दफा था. विपक्ष इसे प्रधानमंत्री पद का अपमान तक कह रही है. अब पीएम का बंगाल चुनाव के मद्देनजर झालमुरही की दुकान पर जाना, एक राजनीतिक स्टंट के तौर पर देखा जा रहा है.
जनसंपर्क या छवि निर्माण?
झारग्राम में मोदी का “साधारण” रूप निश्चित ही लोगों को आकर्षित कर रहा है, लेकिन विपक्ष इसे एक सुनियोजित छवि निर्माण (image building) की कवायद मानता है. उनका कहना है कि जब जमीनी स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे बने हुए हैं, तब सिर्फ झालमुरही खाने जैसे स्टंट से वास्तविक समस्याओं का समाधान निकल पाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ है राजनीति में प्रतीक और संदेश उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितनी नीतियां. लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रतीकात्मक क्षण लंबे समय में जनता की उम्मीदों पर खरे उतर पाएंगे, या फिर ये सिर्फ चुनावी रणनीति तक सीमित रह जाएंगे?
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