Haemophilia मरीजों के लिए खुलेगा नया सेंटर, Rims से सेंटर हुआ बंद
राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में हीमोफीलिया ट्रीटमेंट सेंटर के बंद होने से मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है। पहले जहां मरीजों को एक ही जगह पर इलाज और फैक्टर उपलब्ध हो जाता था, अब उन्हें सदर और अन्य अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं,

Jharkhand (Ranchi): स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी की माने तो रांची को मेडिकल हब बनाया जाएगा । लेकिन उनका यह सपना हकीकत में सिर्फ सपना ही लग रहा है। मरीजों को अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझना पड़ रहा है। राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में हीमोफीलिया ट्रीटमेंट सेंटर के बंद होने से मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है। पहले जहां मरीजों को एक ही जगह पर इलाज और फैक्टर उपलब्ध हो जाता था, अब उन्हें सदर और अन्य अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे समय और पैसे दोनों की मार झेलनी पड़ रही है।
सदर अस्पताल ले रहा रिम्स का लोड
रिम्स का सेंटर बंद होने के बाद अब मरीजों का सहारा सिर्फ रांची सदर अस्पताल रह गया है । यहां हर महीने 300 से 350 हीमोफीलिया मरीज फैक्टर और नॉन-फैक्टर इंजेक्शन के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे अस्पताल पर दबाव बढ़ गया है। अधिक भीड़ के कारण मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है और कई बार बिना इलाज के ही लौटना पड़ता है। कुछ मरीजों को रविवार को बुलाया जा रहा है, लेकिन उस दिन डॉक्टरों की अनुपलब्धता से दिक्कत और बढ़ जाती है।
नए सेंटर खोलने की हो रही तैयारी
इस स्थिति को देखते हुए हीमोफीलिया सोसायटी ने हरमू अस्पताल में नया सेंटर खोलने की योजना बनाई है। इस सेंटर में पीडियाट्रिक, ऑर्थो, सर्जरी और फिजियोथेरेपी के विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध होंगे, जिससे मरीजों को बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद है। सोसायटी के अनुसार, रांची में पूरे राज्य से मरीज आते हैं, ऐसे में एक अतिरिक्त सेंटर राहत देगा। नए सेंटर से मरीजों और रांची सदर अस्पताल दोनों को राहत मिलेगी।
नॉन-फैक्टर इंजेक्शन दे रहा राहत
सरकार ने हीमोफीलिया मरीजों के इलाज के लिए बजट बढ़ाकर 35 करोड़ रुपये कर दिया है, जिससे बेहतर उपचार की उम्मीद जगी है। वहीं इलाज के क्षेत्र में इमिसीजुमैब जैसे नॉन-फैक्टर इंजेक्शन भी राहत दे रहे हैं। इसे लगाने के बाद 30 से 35 दिनों तक इंटरनल ब्लीडिंग नहीं होती, जिससे मरीजों को बार-बार फैक्टर लेने की जरूरत कम हो गई है।
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