Muharram 2026 : कर्बला में भारत के मोहियाल ब्राह्म्णों ने भी दी थी अपनी शहादत, जो कहलाए हुसैनी ब्राह्मण
मुहर्रम इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है और इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हैं.

Muharram 2026 : मुहर्रम इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है और इस दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हैं. कर्बला में इमाम हुसैन ने अपने 72 अनुयायियों के साथ अपनी कुर्बानी दी थी, लेकिन यजीद के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया. लेकिन क्या आपको पता है कि इस जंग के बाद भारत के योद्धाओं ने भी अपनी कुर्बानी दी थी, जिसका नेतृत्व किया था राहिब सिद्ध दत्त ने जो एक मोहयाल ब्राह्म्ण थे जिन्हे बाद में हुसैनी ब्राह्म्ण की उपाधि मिली. इस जंग में उनके साथ उनके सात बेटों ने भी अपनी कुर्बानी दी थी.

राहिब सिद्ध दत्त व्यापार के सिलसिले में अरब आते जाते रहते थे. वे एक सुखी और समृद्ध शासक थे लेकिन उन्हे कोई संतान नहीं था जिससे वे दुखी रहते थे. अरब में किसी ने उन्हे इमाम हुसैन से मिलने की सलाह दी और वे उनसे मिले इमाम हुसैन ने उनके लिए दुआ की और सात पुत्रों का आशीर्वाद दिया जो कि सच हुआ. उसके बाद राहिब दत्त ने जीवन भर सेवा और साथ देने का वादा किया. जब राहिब दत्त को पता चला कि इमाम हुसैन को यजीद ने कर्बला में घेर लिया है तो वे अपनी सेना के साथ कर्बला के लिए कूच कर गए जिनमें उनके सातों पुत्र भी शामिल थे. लेकिन अफसोस कि उनके पहुंचने से पहले ही इमाम हुसैन शहीद हो गए. घोर निराशा से भरे हुए राहिब दत्त ने अपनी तलवार अपनी गर्दन से लगा ली और कहा कि जब हम इमाम हुसैन को नहीं बचा सके तो फिर जीने का क्या मतलब. लेकिन इमाम के योद्धा अमीर मुख्तार ने उन्हे रोका और कहा कि आत्महत्या करने के बजाए दुश्मन से बदला लेना चाहिए. उसके बाद राहिब दत्त और उनकी सेना ने चुन चुन कर यजीद की सेना से बदला लिया. इसी बीच यजीद की सेना इमाम हुसैन का सिर नेज़ो में लेकर कूफा की ओर जा रही थी। राहिब दत्त ने उनके सिर के बदले अपने सातों बेटों का सिर दे दिया. युद्ध के बाद उन्हे उनके वंशजों को इनकी कुर्बानी के लिए हुसैनी ब्राह्म्ण का खिताब दिया गया. जंग के बाद कुछ हुसैनी ब्राह्म्ण वहीं बस गए जो जगह आज भी हिंदिया के नाम से जाना जाता है.
हुसैनी ब्राह्म्णों के कर्बला के जंग से जुड़ी एक और कहानी प्रचलित है कि उज्जैन के राजा चंद्रगुप्त द्वीतीय यानि विक्रमादित्य का विवाह इरान के राजा की बेटी मेहर बानो से हुई थी और उसकी बहन सेहर बानो का विवाह इमाम हुसैन से हुआ था. और कर्बला में चंद्रगुप्त द्वीतीय ने यहां से सेना की टुकड़ी भेजी थी लेकिन चंद्रगुप्त द्वीतीय का काल खंड 350 से 415 ईसवी तक था और इमाम हुसैन का जीवन काल 626 से 680 ईसवी था इस हिसाब से दोनों के कालखंड में करीब 300 साल का अंतर है. इसलिए ये तर्कसंगत नहीं लगता।
लेकिन राहिब दत्त ने कर्बला में कुर्बानी दी थी इसके सुबूत हैं. कर्बला के संग्रहालय में हुसैनी ब्राह्म्णों के नाम दर्ज है । इतिहासकार टी पी रसेल ने 1938 में लिखी 'द हिस्ट्री ऑफ द मुहियाल्स' में पेज 42-43 में हुसैनी ब्राह्मणों का जिक्र किया है।
हुसैनी ब्राह्म्ण मुख्य रूप से पंजाब और सिंध (अब पाकिस्तान) और दक्षिण अफगानिस्तान में रहता था. बंटवारे के बाद, इनमें से अधिकांश परिवार भारत आ गए। मोह्याल ब्राह्म्णों में कई जानी मानी हस्तियां हैं. जिनमें अभिनेत्री गीता बाली, सुनील दत्त, संजय दत्त, शायर कश्मीरी लाल जाकिर, साबिर दत्त, रीना दत्त और नंद किशोर विक्रम के अलावा रांची के मूर्धन्य पत्रकार पद्मश्री बलबीर दत्त जैसी हस्तियां शामिल हैं।
(लेख : निलय सिंह)
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