"एक हाथ में बंदूक दूसरे में कलम", ऐसे थे क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त, उनकी जयंती पर जानिए उनका जीवन परिचय
1925 के काकोरी कांड का हिस्सा रहे क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त का नाम रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां आदि महान क्रांतिकारियों के साथ जोड़ा जाता है. साल 1997 में मीडिया को दिए अपने अंतिम इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि..

Aaj Ka Itihas: मन्मथनाथ गुप्त - एक प्रमुख क्रांतिकारी और लेखक थे. जिनका जन्म 7 फरवरी 1908 को वाराणसी में हुआ था. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले मन्मथनाथ गुप्त का 1925 में हुए काकोरी कांड में भी अहम योगदान था. इस समय गुप्त केवल 17 साल के थे, जबकि वे 13 वर्ष की आयु से ही राजनीतिक जीवन में सक्रिय हो चुके थे. काकोरी कांड को लेकर चलाए गए अभियोग में उन्हें 14 वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई थी. वे ऐसे क्रांतिकारी योद्धा थे जिनके लिए कहा जाता था कि "उनके एक हाथ में बंदूक तो दूसरे हाथ में कलम" रखते हैं.
ककोरी कांड में चार क्रांतिवीरों राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला ख़ां, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी दे दी गई थी. वहीं मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया था. उन्हें फांसी की सजा इसलिए नहीं हुई थी, क्योंकि उनकी उम्र कम थी.
साल 1921 में भारत में ब्रिटिश युवराज के स्वागत की तैयारियां चल रही थी, तब उनके स्वागत का विरोध करने आगे आए मशहूर क्रांतिकारी लाला लाजपत राय. मन्मथनाथ गुप्त ने भी लाला जी का समर्थन किया. इसी विरोध प्रदर्शन के कारण उन्हें अंग्रेजी हुकुमत द्वारा 3 माह की सजा सुना दी गई. जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने काशी विद्यापीठ से विचारक की परीक्षा पास की. जिसके बाद उनकी मुलाकात रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां आदि क्रांतिकारियों से हुई. जिसने उनके क्रांतिकारी जीवन को दिशा देने का काम किया.
19 दिसंबर 1997 में डीडी नेशनल को दिए अपने अंतिम साक्षात्कार के दौरान उन्होंने फांसी की सजा की जगह आजीवन कारावास की सजा मिलने पर खेद प्रकट किया था. इस दौरान उन्होंने काकोरी कांड में हुई गलती को भी स्वीकारा था. 26 अक्टूबर साल 2000 को गुप्त जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया.
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