50 साल पुराना मौखिक बंटवारा भी पूरी तरह वैध!, जमीन विवाद पर झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा और ऐतिहासिक फैसला
झारखंड हाईकोर्ट ने दुमका के कान्हैयापुर गांव के करीब 50 साल पुराने जमीन विवाद में मौखिक पारिवारिक बंटवारे को वैध माना। अदालत ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज की।

Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए करीब 50 साल पुराने मौखिक पारिवारिक बंटवारे को कानूनी तौर पर पूरी तरह सही माना है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने दुमका जिले के जरमुंडी थाना क्षेत्र स्थित कान्हैयापुर गांव से जुड़े 1975 के पुराने टाइटल पार्टिशन सूट पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं की रिट याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि मौखिक तौर पर हुआ यह पारिवारिक बंटवारा गवाहों के बयानों, पक्के सबूतों और खुद याचिकाकर्ताओं की बातों से पूरी तरह साबित होता है, इसलिए इसमें अदालत के दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
50 साल से कानूनी पचड़े में फंसा था कान्हैयापुर की जमीन का मामला
यह पूरा विवाद कान्हैयापुर मौजा की जमीन के बंटवारे को लेकर था, जो पिछले पांच दशकों से अदालतों के चक्कर काट रहा था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि यह जमीन पुराने सर्वे (गैंटजर सेटलमेंट) के समय उनके पूर्वजों के नाम संयुक्त रूप से दर्ज थी और परिवार के बीच कभी कोई लिखित कानूनी बंटवारा नहीं हुआ था। इसके उलट दूसरे पक्ष का कहना था कि जमीन का मौखिक पारिवारिक बंटवारा कई दशक पहले ही आपसी सहमति से हो चुका था और सभी लोग अपने-अपने हिस्से की जमीन पर दशकों से शांति से काबिज हैं और खेती-बाड़ी कर रहे हैं।
निचली अदालतों के फैसले को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि इस केस से जुड़े तीनों निचली अदालतों और संबंधित अधिकारियों ने सभी सबूतों की बारीकी से जांच करने के बाद एक जैसा और ठोस फैसला दिया था। अदालत ने अपने आदेश में साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आम तौर पर निचली अदालतों द्वारा तय किए गए तथ्यों और सबूतों की दोबारा पड़ताल नहीं करता है, जब तक कि उनमें कोई बड़ी कानूनी खामी न दिखे। इस आधार पर अदालत ने मौखिक बंटवारे को सही मानते हुए 50 साल पुराने इस मुकदमे का निपटारा कर दिया।
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