युवाओं की मेहनत अनदेखा कर रही सरकार ! नौकरी के इंतजार में यूं ही चल रही दौड़
अपने सपनों की उड़ान लिए सूरज की पहली किरण में युवा राजधानी के मैदानों मे दौड़ लगा रहे हैं लेकिन इनपर सरकार की नजर तक नहीं पड़ रही. अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार की तरफ से वैकेंसी तो निकाली जाती है लेकिन बहाली पूरी नहीं की जाती है जिससे राज्य के युवाओं में बेरोजगारी जारी है.

Special News: सूरज निकले के बाद सुबह की पहली किरण के साथ राजधानी की सड़कों और मैदान पर युवा सिर्फ अपने फिटनेस ही नहीं, बल्कि अपने भविष्य की दौड़ में हैं यह दौड़ किसी के लिए 'सपना' तो किसी के लिए 'परिवार की उम्मीद' है. झारखंड से लेकर देश के करीब सभी कोने में सरकारी नौकरी पाने की ये दौड़ प्रत्येक दिन जारी है. और दौड़ने वाले सभी युवाओं के कदम पर जज्बे की एक कहानी है.
सरकारी नौकरी की तैयारियों में जुटे युवा, रोज लगा रहे दौड़
राजधानी के अलग-अलग मैदानों में सुबह-सुबह आपको एक्सरसाइज करते हजारों युवा अपने सपनों की तैयारी में जुटे दिखेंगे. जो सरकारी नौकरी के लिए प्रत्येक दिन मैदान में उतरते हैं और अपने सपनों को आसमान छूने की जज्बा लिए तैयारी में जुट जाते हैं. इन युवाओं में कोई इंडियन आर्मी, कोई पुलिस तो कोई होमगार्ड की तैयारी में लगा है.
वैकेंसी आती लेकिन लेकिन बहाली पूरी नहीं होती- अभ्यर्थी
तैयारी में जुटी एक अभ्यर्थी निभा कुमारी ने कहा कि राज्य में वैकेंसी आ रही लेकिन बहाली पूरी नहीं की जा रही है वकैंसी की बहाली पूरी होगी तभी तो बेरोजगारी खत्म होगा. और युवाओं को रोजगार मिलेगा. बहुतों के पास बड़ी-बड़ी डिग्री है लेकिन एक नौकरी पाने के लिए सभी मेहनत करने में जुटे है.
वहीं, ट्रेनर पवन कुमार बताते हैं कि युवा मेहनत में कोई कमी नहीं छोड़ते. लेकिन भर्ती निकलने में लगातार देरी और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से उनका मनोबल टूटने लगा है. कई युवाओं के लिए ये दौड़ अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुकी है. सूरज के साथ उठते हैं, मैदान में पसीना बहाते हैं, लेकिन मंज़िल अब भी धुंधली है. सवाल ये है कि कब तक इंतज़ार करेंगे ये युवा?
'सरकार की नज़र युवाओं के मेहनत तक नहीं जाती'
वहीं एक उम्मीदवार के पिता अनिपूर्ण चंद्र सिंह ने कहा कि किसी मां की आंखें अपने बेटे को मैदान में दौड़ते देख गर्व से भर जाती हैं. लेकिन उसी गर्व के पीछे छिपा होता है एक दर्द कि उसका बेटा हर दिन मेहनत करता है, सुबह चार बजे उठकर पसीना बहाता है. फिर भी सरकार की नज़र उस मेहनत तक नहीं पहुंचती. कभी भर्ती रुक जाती है, कभी पेपर लीक हो जाता है. और सपनों की मंज़िल फिर कुछ दूर चली जाती है. सवाल वहीं है क्या कभी सरकार इन बच्चों की मेहनत को देखेगी, या ये दौड़ यूं ही इंतज़ार में चलती रहेगी.
सरकारी नौकरी के लिए ये दौड़ मैदान में ज़रूर होती है, लेकिन असली रेस तो सिस्टम से लड़ाई की है मंज़िल मिले या ना मिले, पर जज़्बा इन युवाओं का कभी नहीं रुकता.
रिपोर्ट- यशवंत कुमार
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