सत्ता फिर आयेगी ममता के हाथ या खिलेगा कमल का फूल? एग्जिट पोल की ग्राउंड रियलिटी!
ममता बनर्जी के बंगाल में बीजेपी अपनी सत्ता काबिज करने के लिए बीते कई महीनों से हाथ-पांव मारती आ रही है. अब चुनाव समाप्त होने के साथ एग्जिट पोल में दोनों पार्टियों में जीत दर्ज करने की होड़ मच गई है. आइए समझने का प्रयास करें कि जनता किसे अपना आशीर्वाद देने जा रही है.

West Bengal Election 2026: बंगाल इलेक्शन के दूसरे चरण में रिकॉर्ड तोड़ 92.67 प्रतिशत जनता ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया. चुनाव खत्म होते ही सत्ता और विपक्ष अपने-अपने जीत का दावा ठोकने में जुट गए हैं. वहीं पत्रकारिता जगत अपने विश्लेषणों के आधार पर एग्जिट पोल पेश करने में भिड़ चुकी है. चुनाव के दोनों चरणों के दौरान राज्य के कई बूथों पर झड़प और हिंसा की खबरें सुर्खियों में बनी रहीं. बीजेपी नेता विकास सरदार पर टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा हमले ने सियासत में गरमाहट ला दी. अब टीएमसी के साथ भाजपा व सभी पार्टियों को मई की चार तारीख का बेसब्री से इंतजार है. इसी दिन बंगाल की जनता के अगले पांच साल की किस्मत निर्धारित करेंगे.
'कमल फूल' पर भारी दीदी का सॉफ्ट कॉर्नर
अधिकांश प्रचलित मीडिया हाउस बीजेपी की जीत का दावा अपने एग्जिट पोल से करती दिख जाएंगी. इसके बावजूद यदि आप किसी भी बंगाल के निवासी से बात करते हैं, तो ग्राउंड रियलिटी इसके ठीक उलट नजर आएगी. खासकर महिलाओं में टीएमसी के लिए एक अलग सोफ्ट कॉर्नर भी है और ममता दीदी के प्रति बेजोड़ समर्थन का भाव भी. हालांकि शत प्रतिशत तो नहीं लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों में ममता और मोदी के बीच कांटे की टक्कर देखी जा सकती है.
बंगालियों को संस्कृति से समझौता मंजूर नहीं
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का बीते 15 वर्षों से सत्ता में बने होने के पीछे सिर्फ उनके द्वारा चलाई जा रही शासन प्रक्रिया ही एक कारण नहीं रही है. बंगाली लोगों को उनकी बंगाली संस्कृति से बेहद लगाव रहा है इतिहास पर नजर डालें तो बंगाल विभाजन, बांग्लादेश का निर्माण आदि कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसने बंगाल निवासियों की भावनाएं आहत करने का और उनमें एकता का प्रसार करने का कार्य किया है. अंग्रेजों द्वारा बंगाल के विभाजन ने सूर्य सेन, प्रफुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, बाघा जतिन और रविंद्रनाथ टैगोर जैसे कई प्रचलित स्वतंत्रता सेनानियों को सक्रिय कर डाला. वहीं पाकिस्तान की क्रूरता के कारण ही आजादी पश्चात पाकिस्तान देश को दो टुकड़ों में बांटने का कार्य किया और एक नया देश बांग्लादेश विश्व नक्शे में उभरकर सामने आया.
उपर्युक्त घटनाएं इस ओर प्रमुखता से इशारा करती हैं कि बंगालियों को उनकी बंगाली संस्कृति से सिर्फ गहरा लगाव ही नहीं है, बल्कि इसके साथ कोई छेड़छाड़ करने का प्रयास करे, तो यह उनके लिए असहनीय होता है. इसे हम वर्तमान में देश भर में चलाई जा रही बीजेपी की लहर से तुलना करके देखें तो बंगाल में भी इसकी लहर यूपी-बिहार-मध्य प्रदेश की तरह चल सकेगी, ये नहीं कहा जा सकता.
बदलाव पर नजर गड़ाए बंगाल की जनता
हालांकि, बंगाल में हिंसा की घटनाएं भी आम हैं, जिससे छुटकारा पाकर ही राज्य की प्रगति संभव है. वहीं संस्कृति पर गर्व का भाव जब रूढ़िवादिता की ओर बढ़ चले, दूसरी संस्कृतियों को न अपनाने का भाव हावी हो जाए, तो इसका सीधा असर आम जनता की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है.
साल 2006 में विश्व प्रसिद्ध और भारत में अग्रणी आईटी कंपनी टाटा बंगाल में नैनो कार परियोजना का प्लांट स्थापित करने वाली थी. जिसका इतना विरोध हुआ कि टाटा को बंगाल छोड़ना पड़ गया. इस हिसाब से अगर देखा जाए, तो बंगाल में बड़ी-बड़ी कंपनियों की स्थापना राज्य हित में अति आवश्यक है. बंगाल की जनता का कुछ तबका राजनीतिक सत्ता में बदलाव का पुरजोर समर्थन करता देखा जा सकता है.
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.






