सिस्टम की हकीकत: ठंड ढा रहा गरीबों पर सितम, कागजों में गर्मी.. खुले आसमान में सोने को मजबूर गरीब-बेघर लोग
ठंड में सड़कों पर रात बिताने वाले गरीबों के लिए राहत की कोई उम्मीद नहीं है. रैन बसेरे कागजों तक सीमित हैं, अलाव जलते नहीं और कंबल दूर की बात है. सरकारी दावे बेकार हैं, जबकि इनकी जिंदगी और मौत के बीच एक कंबल और एक अलाव की दूरी मात्र है.

JHARKHAND: ठंड का मौसम जहां समृद्ध लोगों के लिए खुशी का पैगाम लेकर आता है, वहीं गरीब और बेघर लोगों के लिए काल साबित होता है. सर्व संसाधनों से समृद्ध लोग अनेक जगहों की फहरिस्त तैयार कर रखते हैं, जहां वे इत्मीनान से छुट्टी बिता पाएं और इस मौसम का लुत्फ उठा पाएं. वहीं इसके विपरीत गरीब तबकों के पास बुनियादी सुविधाओं की कमी होने के कारण, जो खुले आसमान में रहने को मजबूर हैं - उनकी जान पर बनी रहती है.
फिर जब हम दिसंबर के महीने में प्रवेश करते हैं, तो ठंड के प्रकोप के कारण न जाने कितने ही गरीब तबकों से मौत की खबरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं. इसे जब हम उन गरीब लोगों के निजी नजरिए से देखते हैं तो सिस्टम की दुर्दशा का अंदाजा नहीं लग पाता. लेकिन ये नजर अंदाज करने वाली बात नहीं है.
ये जग जाहिर है कि कई प्रकार के लुभावने विज्ञापनों-पोस्टरों के जरिए सरकारी विभाग अपना नाम चमकाने में लगे रहते हैं. जिससे निचले तबकों के अपने वोटबैंक को मजबूत किया जा सके. वहीं जब आप असल हालात का मुआयना करते हैं, उसकी हकीकत से रूबरू होते हैं तो मालूम पड़ता है कि मौसम की मार के कारण जा रही जानों के पीछे मौसम से अधिक सिस्टम की खस्ता हालत जिम्मेदार है. जर्जर हालत में गतिमान दीमक लगी घूसखोरी की व्यवस्था जिम्मेदार है.
“रैन बसेरा तो है, पर पता नहीं. अलाव की व्यवस्था है, पर जलता नहीं. कंबल का वादा है, पर पहुंचा नहीं.” ठंड बढ़ रही है, तापमान गिर रहा है, लेकिन सरकारी इंतजामों की परतें उठाने पर सच यही सामने आता है - व्यवस्था का ‘गर्मी’ का दावा सिर्फ फाइलों तक सीमित है, जबकि फुटपाथ पर रात काटने वाले गरीब अब भी सर्द हवाओं के बीच जान बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
रैन बसेरा: कागजों में पूरा, जमीन पर अधूरा
रामगढ़ नगर परिषद क्षेत्र में सिविल सर्जन कार्यालय के सामने संचालित रैन बसेरे को प्रशासन "मॉडल व्यवस्था" बताती है. यहां पुरुषों के लिए 25 और महिलाओं के लिए 10 बेड, गैस चूल्हा, इंडक्शन, बर्तन, बिस्तर, कंबल, रजाई और 24 घंटे केयरटेकर व CCTV मॉनिटरिंग की सुविधा का दावा किया जाता है. हर दिन चार-पांच लोग रात बिताते भी हैं.
लेकिन छावनी परिषद क्षेत्र में बना दूसरा रैन बसेरा इस दावे का उल्टा चेहरा दिखा देता है. यहां सिर्फ दो बेड हैं, न कंबल, न बिस्तर, न ठंड से बचाव का प्रबंध.. और हालात इतने खराब कि कई जरूरतमंदों को वापस लौटना पड़ता है. एक अधूरी व्यवस्था गरीबों के लिए आश्रय नहीं, मजबूरी बन जाती है.
“रैन बसेरा कहां है? पता ही नहीं”- जानकारी के अभाव में वंचित लोग
रातें फुटपाथ पर गुजारने वाले मजदूर रामलाल कहते हैं - “रैन बसेरा कहां है, इसका पता ही नहीं चलता. अगर जानकारी होती तो हम चले जाते. ठंड में हालत खराब हो जाती है.” स्टेशन रोड पर रहने वाली लीलावती देवी बताती हैं - “सुना है रैन बसेरा है, पर ठंड से बचाव की व्यवस्था नहीं है.”
इससे बड़ा सवाल है कि कागजों पर बने इंतजाम, अगर ज़रूरतमंद तक ही न पहुंचें, तो उनका मतलब क्या?
अलाव की व्यवस्था: आधी रात से पहले ही बुझ जाती है आग
छावनी परिषद के अभियंता दावा करते हैं कि शहर के कई स्थानों - पुराना/नया बस स्टैंड, बाजारटांड़, नयासराय, सुभाष चौक, रांची रोड - पर अलाव की व्यवस्था है.
लेकिन हकीकत यह है कि मजदूर, रिक्शाचालक, बुजुर्ग और फुटपाथ पर रहने वाले लोग कहते हैं -“अलाव देर रात तक जलता ही नहीं, हम फिर ठंड में कांपते रह जाते हैं.”
जबकि दिसंबर की सर्दी लगातार बढ़ रही है और तापमान कई जिलों में 9°C तक जा पहुंचा है. मौसम विभाग ने रांची, रामगढ़, हजारीबाग, गुमला, बोकारो, खूंटी सहित कई जिलों के लिए येलो अलर्ट तक जारी कर दिया है - पर राहत अब तक नदारद.
रांची और आसपास - कड़ाके की ठंड, सरकार की चुप्पी
रांची, खूंटी, बोकारो, रामगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में तापमान में गिरावट ने गरीबों की मुसीबत बढ़ा दी है. सुबह काम की तलाश में निकलने वाले मजदूर बताते हैं - “ठंड बढ़ गई है, चौक-चौराहों पर अलाव नहीं है. कंबल भी नहीं मिले.” हर साल प्रशासन कंबल वितरित करता था, लेकिन इस बार अभी तक न वितरण शुरू हुआ, न अलाव व्यवस्था पूरी हुई. गांव के निवासी कहते हैं - “इस बार ठंड ज्यादा है, पर प्रशासन गायब है. गरीब क्या करे?”
सामाजिक कार्यकर्ताओं की चेतावनी: “कागज़ी इंतजाम से ठंड नहीं भागती”
सामाजिक कार्यकर्ता रविन्द्र कुमार साफ कहते हैं - “रैन बसेरा बनाकर छोड़ देना काफी नहीं है. सुविधाएं पूरी हों, प्रचार-प्रसार हो, तभी लोग वहां पहुंचेंगे. जब तक ईमानदार और संवेदनशील कार्रवाई नहीं होगी, गरीब ठंड में मरते रहेंगे.” उनके अनुसार निगम और छावनी परिषद को संयुक्त अभियान चलाकर फुटपाथ, पुल के नीचे और रेलवे स्टेशन पर रहने वालों को रैन बसेरों तक सक्रिय रूप से लाना चाहिए.
सरकार की जिम्मेदारी - कहां है संवेदनशीलता?
तापमान गिर रहा है, सड़कों पर गरीब ठिठुर रहे हैं, अलाव अधूरे हैं, रैन बसेरे आधे-अधूरे.. और जानकारी का अभाव. ऐसे में सवाल उठता है - क्या सरकार सर्दियों में सिर्फ फाइलों को गर्म रख रही है?
गरीबों की जिंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक कंबल, एक अलाव और एक रैन बसेरा की बस दूरी है. लेकिन प्रशासन की कमजोरी इस दूरी को और लंबा कर रही है.
जमीन पर काम नहीं होगा तो ठंड मौत बनकर आएगी
सरकारी फाइलें चाहे कितनी ही सुविधाओं का जिक्र करें, पर शहर की सड़कों पर सिमटकर सोते लोग इस व्यवस्था का असली चेहरा हैं. जब तक - रैन बसेरों में वास्तविक सुविधाएं, अलाव की नियमित व्यवस्था, कंबलों का वितरण और जनता तक सही जानकारी नहीं पहुंचेगी, तब तक गरीबों की रातें काली और ठिठुरती ठंड से भरी रहेंगी.
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