दूल्हे ने अपनी ही शादी में पिया मां का दूध!, IPS के विवाह में दिखी 'आंचल पीना' रस्म, जानें इस अनोखी परंपरा का रहस्य
IPS कृष्ण कुमार और अंशिका वर्मा की शादी में दिखी बिश्नोई समाज की ‘आंचल पीना’ रस्म क्या है? जानें इस अनोखी परंपरा, 29 नियमों और पर्यावरण संरक्षण की कहानी।

National News Desk: प्रकृति और वन्यजीवों की रक्षा के लिए सदियों से समर्पित बिश्नोई समाज अपनी अनोखी परंपराओं और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। हाल ही में IPS कृष्ण कुमार (KK) बिश्नोई और IPS अंशिका वर्मा की शादी के दौरान ‘आंचल पीना’ की परंपरा ने एक बार फिर इस समाज की खास मान्यताओं को चर्चा में ला दिया।
‘सिर सांटे रूख रहे, तो भी सस्तो जाण’... पेड़ के लिए जान कुर्बान करने का संदेश
बिश्नोई समाज से जुड़ी एक प्रसिद्ध उक्ति है, ‘सिर सांटे रूख रहे, तो भी सस्तो जाण।’ यानी अगर सिर कटवाकर भी एक पेड़ बच जाए तो यह सौदा सस्ता है। यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि बिश्नोई समाज की प्रकृति के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाने वाली भावना है।
राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों से विकसित हुआ बिश्नोई समाज पेड़-पौधों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए सदियों से जाना जाता है। गुरु जंभेश्वर, जिन्हें जांभोजी के नाम से भी जाना जाता है, ने 15वीं शताब्दी में इस समुदाय को 29 नियमों पर आधारित जीवनशैली दी थी।
बिश्नोई नाम का क्या मतलब है?
‘बिश्नोई’ शब्द को आम तौर पर बीस और नौ, यानी 20+9 से जोड़कर देखा जाता है। गुरु जांभोजी द्वारा बताए गए 29 नियम इस समुदाय के सामाजिक, धार्मिक और पर्यावरणीय जीवन का आधार माने जाते हैं।
इन नियमों में स्वच्छता, संयम, सत्य, अहिंसा, जीवों के प्रति दया और पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया है।
IPS शादी से फिर चर्चा में आई ‘आंचल पीना’ की परंपरा
उत्तर प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी कृष्ण कुमार (KK) बिश्नोई और IPS अंशिका वर्मा की शादी राजस्थान के जोधपुर में हुई। शादी समारोह से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो के बीच एक परंपरा ने खास ध्यान खींचा, ‘आंचल पीना’।
इस परंपरा में विवाह जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर दूल्हे द्वारा अपनी मां के दूध का स्मरण करते हुए आंचल से दूध पीने की रस्म निभाई जाती है। इसे मातृ ऋण और मां के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
इस परंपरा का संदेश है कि व्यक्ति जीवन में कितना भी बड़ा मुकाम हासिल कर ले, वह अपनी मां के त्याग और संस्कारों को कभी नहीं भूल सकता।
हिरणों को परिवार का हिस्सा मानता है समाज
बिश्नोई समाज की सबसे चर्चित विशेषताओं में वन्यजीवों के प्रति उनकी संवेदनशीलता शामिल है। खासकर काले हिरण और चिंकारा जैसे वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर यह समाज लंबे समय से जाना जाता है।
बिश्नोई बहुल गांवों में वन्यजीवों को लेकर लोगों का रवैया बेहद संवेदनशील रहा है। कई स्थानों पर घायल या अनाथ हिरणों के बच्चों की देखभाल ग्रामीण अपने परिवार के सदस्यों की तरह करते हैं।
खेजड़ली का बलिदान आज भी मिसाल
बिश्नोई समाज के पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में खेजड़ली बलिदान का विशेष स्थान है।
साल 1730 में जोधपुर के महाराजा के आदेश पर खेजड़ली गांव में पेड़ काटने पहुंचे सैनिकों के सामने अमृता देवी बिश्नोई और उनके समुदाय के लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
परंपरागत रूप से इस घटना में 363 लोगों के बलिदान का उल्लेख मिलता है। अमृता देवी से जुड़ी प्रसिद्ध भावना थी कि पेड़ बचाने के लिए अपना सिर कटाना भी मंजूर है।
यही घटना आगे चलकर भारत में पर्यावरण संरक्षण के आंदोलनों के लिए प्रेरणा का महत्वपूर्ण उदाहरण बनी।
हरे पेड़ काटना और जीव हत्या वर्जित
बिश्नोई समाज की मान्यताओं में हरे पेड़ों को काटना और जीवों की हत्या करना वर्जित माना गया है। शाकाहार, जीव दया और प्रकृति संरक्षण को जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है।
यही वजह है कि बिश्नोई समाज को अक्सर प्रकृति और वन्यजीवों का संरक्षक समुदाय कहा जाता है।
अंतिम संस्कार में भी पर्यावरण संरक्षण का ध्यान
बिश्नोई समाज की एक अलग परंपरा अंतिम संस्कार से भी जुड़ी है। समाज में मृतकों को आम तौर पर दफनाने की परंपरा रही है।
इसके पीछे पर्यावरण संरक्षण का तर्क बताया जाता है। शव को जलाने में लकड़ी की जरूरत पड़ती है, जबकि दफनाने से पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं पड़ती।
बिश्नोई समाज के 29 नियम क्या हैं?
गुरु जांभोजी की शिक्षाओं से जुड़े 29 नियमों में जीवन के अलग-अलग पहलुओं को शामिल किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से...
1. प्रसूता महिला को 30 दिन विश्राम देना।
2. मासिक धर्म के दौरान पांच दिन विश्राम देना।
3. प्रातः स्नान करना।
4. शील और सदाचार का पालन करना।
5. संतोषी जीवन जीना।
6. तन और मन की शुद्धता बनाए रखना।
7. सुबह-शाम संध्या करना।
8. शाम को आरती और ईश्वर का स्मरण करना।
9. नियमित हवन करना।
10. जीवों की रक्षा के लिए पानी छानकर पीना।
11. वाणी को शुद्ध रखना और मधुर बोलना।
12. ईंधन को देखकर इस्तेमाल करना ताकि उसमें जीव-जंतु न हों।
13. दूध को छानकर उपयोग करना।
14. क्षमाशील और सहनशील रहना।
15. सभी जीवों के प्रति दया और नम्रता रखना।
16. चोरी नहीं करना।
17. निंदा और चुगली से बचना।
18. झूठ नहीं बोलना।
19. अनावश्यक विवाद से बचना।
20. अमावस्या का व्रत रखना।
21. भगवान विष्णु का स्मरण करना।
22. जीव दया और अहिंसा का पालन करना।
23. हरे पेड़ नहीं काटना।
24. काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना।
25. स्वयं तैयार की गई पवित्र रसोई का भोजन करना।
26. पशुओं, खासकर उपयोगी पशुधन की रक्षा करना।
27. बैलों को बधिया न करना।
28. शराब, तंबाकू, भांग और अन्य नशे से दूर रहना।
29. मांसाहार का त्याग कर शाकाहारी जीवन अपनाना।
बिश्नोई परंपरा से जुड़े विवरणों में नीले कपड़े से परहेज का भी उल्लेख मिलता है। इसके पीछे पारंपरिक रूप से यह मान्यता बताई जाती है कि पुराने समय में नीला रंग तैयार करने की प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में वनस्पति और छोटे जीवों को नुकसान पहुंचता था।
प्रकृति को संसाधन नहीं, परिवार मानने की सोच
बिश्नोई समाज की सबसे बड़ी पहचान उसकी पर्यावरण-केंद्रित जीवनशैली है। पेड़ और वन्यजीवों को केवल प्राकृतिक संसाधन न मानकर उनके संरक्षण को धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ना इस समुदाय को विशिष्ट बनाता है।
यही वजह है कि सदियों पहले दिया गया पेड़ और जीव बचाने का संदेश आज के पर्यावरण संरक्षण और Sustainable Living की सोच से भी जुड़ा हुआ नजर आता है।
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