रिम्स की थाली में अव्यवस्था का स्वाद, बजट बढ़ा, सुविधा नहीं — टेंडर की शर्तें कागजों तक सीमित
टेंडर की शर्तें कागजों तक सीमित

रिम्स की थाली में व्यवस्था का स्वाद
रिम्स में मरीजों के लिए भोजन की व्यवस्था भी किसी कहानी से कम नहीं है। कागज पर देखें तो लगता है कि मरीजों के लिए किसी अच्छे होटल जैसा मेन्यू तैयार है- तीन वक्त का भोजन, दो वक्त चाय और स्नैक्स, सप्ताह में पनीर, अंडा और चिकन भी। लेकिन जब यह व्यवस्था जमीन पर उतरती है तो मरीजों की थाली में स्वाद से ज्यादा सवाल नजर आने लगते हैं।
पैसे बढे,लेकिन बदलाव नहीं
20 नवंबर 2025 से रिम्स में करीब 1700 मरीजों को भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी घोष और राय एजेंसी को दी गई है। नई एजेंसी के साथ उम्मीदें भी नई थीं। पहले जहां प्रति मरीज प्रतिदिन 129 रुपये खर्च किए जाते थे, अब इसे बढ़ाकर 150 रुपये कर दिया गया। लोगों को लगा कि जब पैसे बढ़े हैं तो शायद मरीजों की थाली भी थोड़ी और बेहतर और व्यवस्थित हो जाएगी। लेकिन तस्वीर बताती है कि बदलाव शायद फाइलों और टेंडर के कागजों तक ही सीमित रह गया है।
टेंडर में मरीज को बेड तक भोजन
टेंडर के अनुसार मरीजों को भोजन उनके बेड तक पहुंचाने की जिम्मेदारी एजेंसी की है। सुनने में यह व्यवस्था काफी अच्छी लगती है, क्योंकि मरीज अस्पताल में इलाज कराने आता है, लाइन में लगने नहीं। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी मरीजों के परिजन वार्ड के बाहर लाइन लगाकर भोजन लेने को मजबूर हैं। भोजन का समय होते ही परिजन ट्रॉली की तरफ दौड़ते नजर आते हैं और मरीज अपने बेड पर इंतजार करता रहता है। यानी टेंडर में भले ही बेड तक भोजन लिखा हो, लेकिन जमीन पर लाइन में भोजन वाली व्यवस्था ही चल रही है
रस्ते में मिलन कर लेता है भोजन
भोजन की पैकिंग और सप्लाई की व्यवस्था भी अपने आप में एक अलग अनुभव देती है। किचन से अलग-अलग प्लेट में पैक कर भोजन वार्ड तक भेजा जाता है, लेकिन रास्ते में प्लेटों का ऐसा मेल-मिलाप हो जाता है कि चावल, दाल और सब्जी आपस में घुलमिल जाते हैं। वार्ड तक पहुंचते-पहुंचते कई बार थाली का रूप बदलकर खिचड़ी जैसा हो जाता है। मरीज को समझ नहीं आता कि वह मेन्यू के हिसाब से खाना खा रहा है या फिर रास्ते की दोस्ती का परिणाम।
मरीजों को डीप प्लेट का इंतजार
टेंडर में यह भी व्यवस्था है कि मरीजों को डीप स्टील प्लेट में भोजन दिया जाएगा ताकि खाना सही मात्रा में और व्यवस्थित तरीके से परोसा जा सके। लेकिन 2021 से अब तक यह व्यवस्था जमीन पर नहीं उतर सकी है। प्लेटें बदलने की बात कई बार हुई, एजेंसी भी बदल गई, पैसे भी बढ़ गए, लेकिन मरीज की थाली आज भी उसी इंतजार में है
कागज पर शानदार मेन्यू
सरकार की ओर से रिम्स में भर्ती मरीजों को निशुल्क और संतुलित भोजन देने की व्यवस्था है।
मेन्यू में चावल, दाल, हरी सब्जी और दही शामिल है। सप्ताह में दो दिन पनीर, दो दिन अंडा करी और दो दिन चिकन देने का भी प्रावधान है। रात में रोटी और सब्जी दी जाती है। इसके अलावा डायबिटिक, शाकाहारी और मांसाहारी मरीजों के लिए अलग-अलग भोजन व्यवस्था की सुविधा भी है। गंभीर मरीजों और नवजात बच्चों के लिए हर दो घंटे पर लिक्विड डाइट देने की व्यवस्था भी की गई है। कागज पर यह व्यवस्था किसी आदर्श अस्पताल की तस्वीर पेश करती है।
थाली में सवाल अभी बाकी
लेकिन सवाल यह है कि जब व्यवस्था इतनी अच्छी है तो मरीजों की थाली में असंतोष क्यों नजर आता है। मरीज और उनके परिजन अक्सर यही कहते हैं कि भोजन तो मिल जाता है, लेकिन व्यवस्था उतनी व्यवस्थित नहीं दिखती जितनी होनी चाहिए। अस्पताल में इलाज कराने आए मरीज के लिए दवा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी संतुलित और समय पर मिलने वाला भोजन भी है।
रिम्स जैसे बड़े अस्पताल में भोजन व्यवस्था सिर्फ खाना परोसने का काम नहीं है, बल्कि यह मरीज की देखभाल का अहम हिस्सा है। इसलिए जरूरी है कि टेंडर की शर्तें सिर्फ फाइलों में नहीं, बल्कि वार्ड तक भी पहुंचें। क्योंकि मरीज को सिर्फ दवा ही नहीं, बल्कि बेहतर व्यवस्था भी चाहिए।
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