एक भाषा, एक लिपि..., दुमका में उठी संताली 'ओलचिकी' में KG से PG तक पढ़ाई की मांग, ग्रामसभा में पास हुए बड़े प्रस्ताव!
दुमका के माचखिचा गांव की ग्रामसभा में संताली ओलचिकी लिपि में KG से PG तक पढ़ाई की मांग उठी। ग्रामीणों ने ओलचिकी शिक्षकों की भर्ती और संताली को सरकारी भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा।

Dumka: दुमका जिले के माचखिचा गांव में ग्रामीणों ने मिलकर एक बड़ी बैठक की। यह बैठक उनकी अपनी पुरानी और पारंपरिक मांझी-परगना व्यवस्था के तहत बुलाई गई थी, जिसे स्थानीय भाषा में 'कुल्ही दुरुप' कहा जाता है। इस पूरी बैठक की अगुवाई गांव के प्रधान राजा मरांडी ने की। बैठक का असली मकसद संथाली भाषा की अपनी लिपि 'ओलचिकी' को बढ़ावा देना और लोगों को इसके प्रति जागरूक करना था। गांव के लोगों का कहना है कि नेता और सरकार सिर्फ बड़े-बड़े मंचों और एसी कमरों से बातें करते हैं, लेकिन जमीन पर कोई काम नहीं दिखता। इसलिए अब वे खुद अपनी भाषा और अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए सामने आए हैं।
'एक भाषा, एक लिपि' से ही जुड़ेगा समाज, अलग-अलग लिखावट से हो रहा नुकसान
बैठक में ओलचिकी के इतिहास पर भी खुलकर बात हुई। लोगों ने बताया कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में इस लिपि को बनाया था और अब इसे 100 साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है। साल 2003 में इसे देश के संविधान में भी जगह मिली और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसके सम्मान में सिक्का और डाक टिकट तक जारी किया है। इसके बावजूद आज भी संथाली भाषा को लोग बंगाली, उड़िया, देवनागरी या दूसरी लिपियों में लिखते हैं। अलग-अलग तरीकों से लिखे जाने की वजह से एक जगह के लोग दूसरी जगह की किताब आसानी से नहीं पढ़ पाते। इसलिए गांव वालों की मांग है कि 'एक भाषा, एक लिपि' का नियम लागू हो, ताकि पूरा संथाल समाज एक साथ जुड़ सके।
स्कूल छोड़ रहे हैं बच्चे, ग्रामीणों ने सरकार के सामने रखीं 4 बड़ी मांगें
ग्रामसभा में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि अपनी भाषा में पढ़ाई न होने के कारण बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ रहे हैं। अगर बच्चों को उनकी अपनी मातृभाषा में पढ़ाया जाए, तो उनका मन पढ़ाई में ज्यादा लगेगा। इस बैठक के जरिए मुख्यमंत्री, स्थानीय सांसदों और विधायकों के सामने चार मुख्य मांगें रखी गईं। पहली मांग यह है कि राज्य में केजी से लेकर पीजी तक की पढ़ाई संताली ओलचिकी में कराई जाए। दूसरी, स्कूलों में तुरंत ओलचिकी शिक्षकों की भर्ती की जाए। तीसरी, संताली को झारखंड की पहली सरकारी भाषा का दर्जा मिले। और चौथी मांग यह है कि संथाल इलाकों के सरकारी दफ्तरों के नाम वाले बोर्ड हिंदी के साथ-साथ ओलचिकी में भी लिखे जाएं। बैठक के आखिर में लोगों के बीच ओलचिकी की किताबें भी बांटी गईं।
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