बंदूकें खामोश हुईं पर स्कूलों की छतें जर्जर, नक्सलमुक्त होकर भी विकास को तरस रहा पश्चिमी सिंहभूम का बोयपाईसन गांव!
पश्चिमी सिंहभूम का बोयपाईसन गांव नक्सल हिंसा से उबर चुका है, लेकिन विकास की चुनौतियां बरकरार हैं। जर्जर स्कूल भवन के साथ सड़क, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी सुविधाओं की ग्रामीण मांग कर रहे हैं।

Chaibasa: पश्चिमी सिंहभूम जिले का बोयपाईसन गांव कभी लाल आतंक और बंदूकों की गूंज के साये में जीता था। कदम-कदम पर खौफ का माहौल था और लोग डर के साये में जीने को मजबूर थे। आज हालात बदले हैं, नक्सल समस्या पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है और सुरक्षाबलों ने इलाके में शांति और सुरक्षा का भरोसा कायम किया है। लेकिन आतंक खत्म होने के बाद भी एक बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा है कि क्या गांव की बुनियादी तस्वीर सच में बदल पाई है? बोयपाईसन गांव की मौजूदा जमीनी हकीकत इस सवाल का जवाब तलाशने पर मजबूर करती है।
हाथों में भविष्य, पर सिर पर सुरक्षित छत का भरोसा नहीं
गांव में आज भले ही बंदूकें शांत हो चुकी हैं, लेकिन गांव के सरकारी स्कूल की जर्जर दीवारें किसी बड़े खतरे का अंदेशा दे रही हैं। सुबह-सुबह मासूम बच्चे हाथों में कॉपी-किताबें लेकर अपना भविष्य संवारने स्कूल पहुंचते हैं, लेकिन उनके सिर के ऊपर एक मजबूत और सुरक्षित छत तक मयस्सर नहीं है। भवन की दयनीय हालत देखकर अभिभावक हर वक्त किसी अनहोनी की आशंका से डरे रहते हैं। ग्रामीणों के मन में हर पल यही चिंता सताती है कि पढ़ाई के मंदिर में कहीं कोई गंभीर हादसा न घट जाए।
बरसों बाद जगी उम्मीद, ग्रामीणों की बुनियादी मांगें अब भी अधूरी
यह पीड़ा सिर्फ बोयपाईसन के एक स्कूल की नहीं है, बल्कि उन तमाम सुदूरवर्ती आदिवासी गांवों की है जो वर्षों तक नक्सल हिंसा के कारण विकास की मुख्यधारा से कटे रहे। अब जब इलाके में सुरक्षा का बेहतर माहौल बना है, तो ग्रामीणों की उम्मीदें भी शासन-प्रशासन से बढ़ गई हैं। ग्रामीणों की मांगें बहुत ज्यादा नहीं हैं; वे सिर्फ अपने बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल भवन, पक्की सड़कें, बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं, नियमित बिजली-पानी और एक सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहे हैं।
सुरक्षाबल पहुंच सकते हैं तो विकास योजनाएं क्यों नहीं?
नक्सल प्रभावित इलाकों में बदलाव का असली पैमाना सिर्फ यह नहीं है कि जंगलों में कितने सर्च ऑपरेशन चले या कितने इलाके सुरक्षित घोषित हुए। जमीनी बदलाव का असली अहसास तब होगा जब खौफ की जगह पक्का भरोसा दिखे, हाथ में बंदूक की जगह किताब थमी हो और वीराने की जगह हर गांव तक विकास की रोशनी पहुंचे। जब दुर्गम जंगलों को चीरते हुए सुरक्षाबल इन सुदूर इलाकों तक पहुंच सकते हैं, तो विकास की योजनाएं और सरकारी मशीनरी अब तक क्यों नहीं पहुंची? बोयपाईसन गांव आज इसी सवाल और बुनियादी बदलाव का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts

बच्चों के हाथ में हो किताब, नशे से रहें दूर!, बिरहोर परिवारों के बीच पहुंची हजारीबाग पुलिस की पाठशाला, बच्चों की शिक्षा पर दिया जोर

रेलवे का बड़ा फैसला!, वाराणसी-रांची और वाराणसी-देवघर वंदे भारत का बदला शेड्यूल, सफर से पहले देख लें नई टाइमिंग







