Village of Headhunters: यूं तो अगर आप निकलते हैं नॉर्थ-ईस्ट इंडिया की यात्रा पर, तो आपको एक से बढ़कर एक जगह मिलेंगे, जहां कुछ ही समय बिताकर आपको वहां बस जाने की इच्छा होने लगेगी. लेकिन हम आज नागालैंड के एक छोटे से पर बेहद खूबसूरत गांव 'लोंगवा' की जानकारी लेकर आएं हैं, जो आपकी भारत भ्रमण की इच्छा और ज्ञान का भंडार दोनों दुरुस्त करने का कार्य करेंगे. नागालैंड की पहाड़ियों पर बसा एक छोटा सा गांव, जिसकी महत्ता महज इस बात से पता चलती है कि यह भारत और म्यांमार की सीमा पर बसा हुआ है.

क्यों बोला जाता था 'हेड हंटर्स'
वर्षों से अपनी 'हेड हंटर्स' की उपाधि को धारण किए हुए इस गांव की एक समय तक खासियत थी कि इनके योद्धाओं को हंड हंटर्स बोला जाता था. दूसरे राज्यों या अपने किसी भी दुश्मनों से युद्ध होने की सूरत में योद्धाओं को असल योद्धा तब ही माना जाता था जब उन्होंने अपने दुश्मन का सिर काटकर लाया हो. हालांकि इस हेड हंटिंग के प्रचलन को साल 1940 में ही बंद कर दिया गया था.

पंचम शकम- एक 'हेड हंटर'
पंचम शकम नाम के एक 80 वर्षीय बुजुर्ग हैं, जिन्होंने अपने दुश्मनों के साथ लड़ाई के दौरान सिर काटकर लाया था. वे बताते हैं कि इन्होंने यह कारनामा दो दफा किया था. जिसके बाद 'कोन्याक नागा जनजाति' के विधान के अनुरूप उनके शरीर के कई हिस्सों पर उपाधि स्वरूप कई वस्तुओं को स्थाई तौर पर लगा दिया गया था. ये इनकी संस्कृति का हिस्सा हुआ करते थे. पंचम शकम के शरीर पर आज भी इन टैटुओं और हड्डियों से बने इन श्रृंगारों को देखा जा सकता है. ये श्रृंगार मुख्य रूप से उपलब्धि के तौर पर स्थापित किए जाते थे. साथ ही एक उत्सव जैसा माहौल बन जाता था, जिसमें पूरे कोन्याक जनजाति के लोग शामिल होते थे. वे कहते हैं कि आज भी कोई उन्हें 'हेड हंटर' की उपाधि के साथ पुकारता है, तो उन्हें काफी खुशी होती है, ये उपाधि उन्हें दूसरों से अलग बनाती है.

किन चीजों से बनाए जाते थे वे श्रृंगार?
पंचम शकम बताते हैं कि सिर पर एक मुकुट पहनाया जाता था, जो हॉर्नबिल के पंखों से बनता था. मुकुट के ही बीच में काले भालू की खाल लगी होती थी. इसमें सींग भी लगाई जाती थी, जो पर्वतीय बकरी की होती थी. वे कहते हैं कि ये श्रृंगार एक योद्धा की पोशाक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो देखने में बेहद आकर्षक लगता है.
रग-रग में बसती है देशभक्ति
लोंग्वा गांव में आप यदि बच्चों से बात करेंगे, उनसे पूछेंगे कि वो बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तो आपको उनकी इच्छा जानकर दिल से खुशी महसूस होगी. अधिकांश बच्चों के दिलों में यह सपना बसता है कि वो बड़े होकर भारतीय सेना का हिस्सा बनना चाहते हैं.
लगभग हर घर में मिलेगी बंदूकें
यूं तो नागालैंड के लगभग हर गांव अपने आप में अपनी खासियत समेटे मिल जाएंगे. कोई हॉर्नबिल त्योहार के कारण जाना जाता है, तो कोई पूरे एशिया के पहले ग्रीन विलेज के रूप में जाता है. लेकिन लोंग्वा गांव की खासियत है कि यहां आज भी लोग शिकार किया करते हैं. जो इनका शौख नहीं बल्कि सर्वाइवल का हिस्सा है. इसलिए यहां के लोगों के घरों में बंदूकों का टंगा मिलना एक आम बात है.

एक घर जो हिस्सा है भारत और म्यांमार दोनों का
लोंग्वा गांव में एक राजा का घर भी है, जो आज के समय 35 गांवों के स्वामी हैं. एक समय था जब यहां के राजा के पास 60 से भी अधिक गांव हुआ करते थे. राजा के घर की खासियत है कि इसका आधा हिस्सा भारत की भूमि पर बना है तो दूसरा आधा हिस्सा म्यांमार में आता है.

कैसे पहुंचें लोंगवा गांव?
लोंग्वा गांव नागालैंड की राजधानी कोहिमा से करीब 389 किलोमीटर दूर है. यहां तक आप कार या टू-व्हीलर से आसानी से पहुंच सकते हैं. हालांकि रास्ता पहाड़ी और घुमावदार है, लेकिन प्राकृतिक नजारों के बीच यह यात्रा यादगार बन जाती है.

सिबसागर से लोंगवा की दूरी
असम में स्थित सिबसागर जिला, मोन के सबसे पास का शहर है, जहां से लोंगवा पहुंचने में लगभग 3-4 घंटे लगते हैं. लोंगवा जाने का रास्ता सुंदर चाय बागानों और पहाड़ी सड़कों से होकर गुजरता है. आप मोकोकचुंग जिले से भी मोन पहुंच सकते हैं. जिसमें सड़क की स्थिति के आधार पर लगभग 9-10 घंटे लगते हैं. जोरहाट और डिब्रूगढ़ मोन के दो सबसे पास के शहर हैं. आप इन दोनों जगहों से आसानी से मोन पहुंच सकते हैं.








