भारत ने UN में कहा—दाता देशों का एजेंडा नहीं, स्थानीय जरूरतें हों सर्वोपरि
भारत ने UN में कहा—दाता देशों का एजेंडा नहीं, स्थानीय जरूरतें हों सर्वोपरि

भारत में शांति निर्माण और दीर्घकालिक स्थिरता पर आयोजित विशेष चर्चा के दौरान भारत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संघर्ष प्रभावित देश में शांति स्थापित करने की प्रक्रिया उसी देश की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप होनी चाहिए। भारत ने कहा कि बाहरी एजेंसियों या दाता देशों की सोच को स्थानीय जरूरतों पर थोपना स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि, राजदूत हरीश पर्वथनेनी ने अपने संबोधन में कहा कि सफल शांति निर्माण की शुरुआत राष्ट्रीय स्वामित्व से होती है। उन्होंने जोर दिया कि संबंधित देशों को अपनी विकास और पुनर्निर्माण रणनीति तय करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका सहयोगी और सहायक की होनी चाहिए।
भारत ने यह भी सुझाव दिया कि वैश्विक सहयोग का ढांचा पारंपरिक दाता और लाभार्थी संबंधों से आगे बढ़कर विश्वास, समानता और आपसी सम्मान पर आधारित होना चाहिए। उनके अनुसार, बाहरी संस्थाओं को केवल वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए, न कि नीतिगत नियंत्रण स्थापित करना चाहिए।
अपने वक्तव्य में भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति निर्माण कोष में लगातार घट रही स्वैच्छिक वित्तीय सहायता पर भी चिंता जताई। भारत का मानना है कि यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो संघर्ष प्रभावित देशों में शांति और विकास के प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह संबोधन संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण व्यवस्था के 20 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित 'यूएन पीसबिल्डिंग वीक' के दौरान दिया गया।
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