जिम्मेदारी तय होना अलग, आपराधिक दोष साबित होना जरूरी!, लोहरदगा जेल ब्रेक मामले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटा
लोहरदगा जेल ब्रेक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने तत्कालीन हेड वार्डन बिद्या भूषण शर्मा की पांच साल की सजा रद्द कर बरी किया। अदालत ने ठोस साक्ष्यों के अभाव में फैसला पलटा।

Lohardaga Jail Break : लोहरदगा मंडल कारा से करीब दो दशक पहले (वर्ष 2006) विचाराधीन कैदी के फरार होने के बहुचर्चित मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने तत्कालीन हेड वार्डन बिद्या भूषण शर्मा को बड़ी राहत दी है। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा हेड वार्डन को सुनाई गई 5 साल के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया। अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जेल मैनुअल के तहत प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होना एक अलग पहलू है, लेकिन किसी अधिकारी को किसी आपराधिक कृत्य में दोषी ठहराने के लिए अपराध के आवश्यक तत्वों को ठोस साक्ष्यों के जरिए साबित करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
गिनती के बाद रहस्यमयी तरीके से फरार हुआ था कैदी उदय नाथ उरांव
यह पूरा मामला 20 मई 2006 का है। लोहरदगा मंडल कारा के वार्ड नंबर पांच में बंद विचाराधीन कैदी उदय नाथ उरांव उर्फ उदय जी दोपहर की नियमित कैदी गिनती में मौजूद था, लेकिन शाम करीब 6 बजे जब दोबारा गिनती कराई गई तो वह जेल से नदारद मिला। बाद में जांच और तलाशी के दौरान उसे भारी मात्रा में नकदी (छह लाख रुपये) और हथियारों के साथ दोबारा गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने जेल के हेड वार्डन बिद्या भूषण शर्मा को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 222 और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी मानते हुए 5 साल की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई थी, जबकि इसी मामले के सह-आरोपी गणेश मिश्रा को पहले ही बरी कर दिया गया था।
'आम तोड़ने भेजने' वाली गेट गार्ड की गवाही पर हाईकोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से जेल गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी नागेंद्र कुमार की गवाही को मुख्य आधार बनाया गया था। गार्ड नागेंद्र ने दावा किया था कि हेड वार्डन बिद्या भूषण शर्मा ने उससे गेट की चाबी ले ली थी और उसे जेल परिसर में आम तोड़ने के लिए भेज दिया था। गार्ड के अनुसार, जब वह 20 से 25 मिनट बाद लौटा तो उसने चाबी वापस ली और शाम की गिनती में कैदी गायब पाया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस गवाही की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने पाया कि चाबी लेने और आम तोड़ने भेजने की यह पूरी कहानी गवाह ने पहली बार विभागीय जांच के दौरान बताई थी, जबकि घटना के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज कराने वाले जेल अधिकारी को इस अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य की कोई जानकारी नहीं दी गई थी। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और विरोधाभास के आधार पर हेड वार्डन को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts

नेपाल के पानी से साहिबगंज में हाहाकार!, कारगिल दियारा में भारी कटाव, घर छोड़ ऊंचे स्थानों की ओर भागे लोग

CBI के बिछाए जाल में फंसे घूसखोर अफसर!, AG ऑफिस रांची के पास लेखा दफ्तर में छापेमारी, रिश्वत लेते धरे गए अकाउंटेंट







