'लोन न चुका पाना सीधे धोखाधड़ी नहीं', झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला ; देवघर में दर्ज केस रद्द
झारखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि केवल लोन डिफॉल्ट या कर्ज न चुका पाना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं है। देवघर के एक आपराधिक मामले को रद्द करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि बकाया राशि की वसूली सिविल प्रक्रिया के तहत की जानी चाहिए, न कि आपराधिक मुकदमे से।

Jharkhand High Court: झारखंड उच्च न्यायालय ने कर्ज चुकता न कर पाने या लोन डिफॉल्ट से जुड़े एक मामले में बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल लोन की रकम बकाया रहने या उसे समय पर वापस न कर पाने मात्र से किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक विश्वासघात या धोखाधड़ी का केस नहीं चलाया जा सकता। धोखाधड़ी (Cheating) का अपराध तभी बनता है, जब यह साबित हो कि लेन-देन की शुरुआत से ही संबंधित व्यक्ति की मंशा बेईमानी या धोखा देने की थी। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की पीठ ने इसी आधार पर बिमलेंदु शेखर झा के खिलाफ देवघर में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
SDJM देवघर के आदेश को हाईकोर्ट ने किया निरस्त
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एसडीजेएम (SDJM) देवघर द्वारा पारित उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें प्रार्थी के खिलाफ प्रथमदृष्टया (Prima Facie) मामला पाते हुए आपराधिक प्रक्रिया शुरू की गई थी। उच्च न्यायालय ने माना कि जब लोन लेने वाले व्यक्ति ने अधिकांश रकम वापस कर दी हो, तो उसे धोखेबाज मानकर क्रिमिनल केस चलाना कानूनन सही नहीं है।
क्या था पूरा मामला?
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, बिमलेंदु शेखर झा बैंक ऑफ इंडिया (BOI) की देवघर शाखा में पदस्थापित थे। उसी दौरान उन्होंने 'देवघर जिला (शहरी क्षेत्र) राष्ट्रीयकृत बैंक कर्मचारी बचत एवं साख स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड' से 9.30 लाख रुपये का कर्ज लिया था।
1. कुल लिया गया लोन: ₹9.30 लाख
2. लौटाई गई राशि: ₹7.50 लाख
3. बकाया राशि का दावा: ब्याज सहित ₹4.85 लाख
जब शेष बकाया राशि का भुगतान नहीं हुआ, तो सहकारी समिति के सचिव ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद उनके खिलाफ देवघर कोर्ट में क्रिमिनल केस दर्ज कर लिया गया था।
दीवानी मामले को क्रिमिनल रूप देना गलत
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि जब याचिकाकर्ता ने 9.30 लाख रुपये में से 7.50 लाख रुपये पहले ही चुकता कर दिए थे, तो इससे साफ जाहिर होता है कि उनकी नीयत शुरू से धोखाधड़ी करने की बिल्कुल नहीं थी। बकाया रकम की वसूली सिविल प्रक्रिया (Civil Suit) के जरिए की जानी चाहिए, न कि इसके लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए। अदालत के इस फैसले से लोन डिफ़ॉल्ट से जुड़े मामलों में कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई है।
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