सरकारी देरी की सजा कर्मचारियों को नहीं!, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 602 कर्मियों की पेंशन का रास्ता साफ
झारखंड हाईकोर्ट ने 602 छंटनी किए गए जनगणना कर्मियों की पेंशन का रास्ता साफ कर दिया। अदालत ने अर्हक सेवा 3 नवंबर 2004 से गिनने का निर्देश दिया और सरकारी देरी पर नाराजगी जताई।

Jharkhand High Court: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के छंटनी किए गए सैकड़ों जनगणना कर्मियों को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इन कर्मचारियों की पेंशन पात्रता (अर्हक सेवा) की गणना 3 नवंबर 2004 से की जाए। अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद वर्षों से अपनी पेंशन के अधिकार के लिए कानूनी जंग लड़ रहे कर्मचारियों के चेहरे खिल उठे हैं।
1992 में हुई थी सेवा समाप्त, 2004 में 602 कर्मियों के समायोजन का हुआ था फैसला
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, इन कर्मचारियों की संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) नियुक्ति 10 जून 1991 से 31 अगस्त 1992 तक बिहार के देवघर क्षेत्र में जनगणना संचालन के क्षेत्रीय उप निदेशक द्वारा संकलनकर्ता के पद पर की गई थी। हालांकि, जसीडीह स्थित क्षेत्रीय सारणीकरण कार्यालय बंद होने के बाद 1 सितंबर 1992 को इनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। इसके बाद झारखंड बनने पर राज्य सरकार ने नीतिगत निर्णय लेते हुए 3 नवंबर 2004 को ऐसे 602 छंटनी किए गए कर्मियों को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के रिक्त पदों पर समायोजित करने का आदेश जारी किया था।
ज्वाइनिंग में प्रशासनिक देरी बनी थी पेंशन में रोड़ा
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि कर्मियों ने बाद के वर्षों में कार्यभार ग्रहण किया, इसलिए 1991-92 की अल्पकालिक संविदा सेवा को पेंशन के लिए अर्हक नहीं माना जा सकता। अदालत ने सरकार की इस दलील को तो स्वीकार कर लिया, लेकिन कर्मचारियों को कार्यभार ग्रहण कराने में हुई अत्यधिक प्रशासनिक देरी पर कड़ा ऐतराज जताया। खंडपीठ ने पाया कि जहां कुछ समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को 2007 में ही ज्वाइनिंग दे दी गई, वहीं कई अन्य कर्मचारियों को 2010 से 2012 के बीच कार्यभार सौंपा गया। इस विभागीय लेटलतीफी के चलते कई कर्मचारी सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंचते-पहुंचते पेंशन के लिए जरूरी न्यूनतम 10 वर्ष की नियमित सेवा पूरी नहीं कर पाए और पेंशन लाभ से वंचित रह गए।
'समान कर्मियों के साथ भेदभाव असंवैधानिक', अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्यभार ग्रहण कराने में हुई देरी पूरी तरह से सरकार की प्रशासनिक प्रक्रिया की विफलता थी, जिसका खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगताया जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि एक जैसी स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारियों के समायोजन के आधिकारिक निर्णय की तिथि यानी 3 नवंबर 2004 से ही उनकी अहर्ता सेवा गिनी जाए, ताकि सभी पात्र कर्मियों को पेंशन का लाभ मिल सके।
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