मनोज कुमार पिंटू / Naxatra News Hindi
Ranchi Desk: भारतीय सनातन संस्कृति के बड़े त्यौहारों में नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रों की बड़ी महिमा है. इन दिनों देश के अलग-अलग हिस्सों में भक्त आदि शक्ति की उपासना में लीन रहते है 22 सितंबर से चल रहे नवरात्रों में माता के गजराज पर आने के सुशी में पूरा माहौल भक्तिमय है झारखंड के गिरिडीह इलाके में शक्ति, साधना का यह पर्व करीब दो सौ सालों से मनाया जा रहा है 18वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में टिकैत (राजाओं) ने अपनी रियासतों में जगत जननी की आराधना शुरू की थी शाही खजाने सें देवी मंडपों में बड़े ही धूमधाम से मां दुर्गा पूजा का अनुष्ठान सम्पन्न होता था इस दौरान कई इलाकों में लगने वाले मेलों में आसपास के दर्जनो गांवों के लोग शामिल होते थे.
गिरिडीह शहर में भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाली श्री श्री आदि दुर्गा "बड़ी मंईयां" का दरबार अद्भुत है नवरात्र के इन पावन दिनों में बड़ी मां अपने भक्तों को स्वाभाविक स्वरूपों की मुद्रा में आशीर्वाद देती है इन दिनों दूर दराज से काफी संख्या में लोग "बड़ी मां"के दरबार में पहुंचकर स्वाभाविक रूपों का दीदार कर मथा टेकने , मन्नतें मांगने आते है.
कहते है कि माता के इस दरबार की महिमा निराली है माना जाता है कि सरल मन से माता के मुखमंडल की आभा को निहारने वाले भक्तों को स्वतः महसूस होता है कि माता रानी स्वाभाविक मुद्रा में आशीष दे रही है बड़ी मां के दरबार की विशेषता है कि महा सप्तमी से विजया दशमी तक माता के मुखमंडल के भाव बदलते है आदि शक्ति बड़ी मां अपने भक्तों को बदलते स्वरूपों का जीवंत एहसास कराती है महा सप्तमी को ममतामयी मां के सुन्दर सलोने रूप के मुखमंडल का भाव बेटी के अपने मायके पहुंचने के बाद जैसा होता है.
महाष्टमी और नवमी को मां का आकर्षक व तेज मुखमंडल की आभा धैर्य के साथ जीवन जीने का संदेश देने के मुद्रा में रहता है विजयादशमी को माता के अलौकिक मुखमंडल की आभा अत्यंत शांत , सौम्य और अपनों से बिछुड़ने की पीड़ा दर्शाती दिखायी देती है मानो ऐसा प्रतीत होता है कि मां के निर्मल हृदय में अपने भक्तों से एक वर्ष के लिए.
बिछुड़ने का भाव है और विदाई की बेला में मां के हजारों भक्त कांधे पर विसर्जन के लिए ले जाते है तो माता के सौम्य मुख मंडल पर विरह की पीड़ा स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती हैं उल्लेखनीय है कि आधुनिकता के इस दौर में भी श्री श्री आदि दुर्गा मंडप में प्रतिमा गढ़ने में सांचों का उपयोग नहीं होता है मूर्तिकार अपने हाथों से प्रतिमा गढ़कर भक्तों को जीवंत रूपों में जगत जननी के दर्शन कराते हैं.








