झारखंड सरकार के जवाब से नाराज हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन!, पाकुड़ पैनम कोल माइंस घोटाले की होगी ACB जांच
पाकुड़ पैनम कोल माइंस मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने ACB जांच का आदेश दिया है। अदालत ने कथित अवैध खनन और 999 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान की जांच रिपोर्ट 5 नवंबर तक मांगी है।

Jharkhand High Court : झारखण्ड उच्च न्यायालय ने पाकुड़ स्थित पैनम कोल माइंस में कथित अवैध खनन और बड़े पैमाने पर हुए राजस्व नुकसान के मामले में कड़ा रुख अख्तियार किया है। राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाब पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए अदालत ने पूरे प्रकरण की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से कराने का बड़ा आदेश दिया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और एसीबी को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे मामले की गहन जांच कर 5 नवंबर तक अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करें। इस मामले की अगली सुनवाई नवंबर में निर्धारित की गई है।
999 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का आरोप, 2015 से लंबित है याचिका
यह जनहित याचिका हाईकोर्ट के अधिवक्ता रामसुभग सिंह द्वारा वर्ष 2015 में दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने पैनम कोल माइंस कंपनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए मामले की सीबीआई (CBI) जांच कराने की गुहार लगाई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कंपनी को वर्ष 2015 में पाकुड़ और दुमका जिले में कोयला खनन का लीज आवंटित हुआ था, लेकिन कंपनी ने तय लीज क्षेत्र और स्वीकृत उत्खनन सीमा से कहीं अधिक कोयला निकाल लिया। स्वीकृत सीमा से ज्यादा कोयला उत्खनन किए जाने के चलते राज्य सरकार के सरकारी खजाने को लगभग 999 करोड़ रुपये के भारी राजस्व का सीधा नुकसान उठाना पड़ा।
डिविजनल कमिश्नर की रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने पर कोर्ट सख्त
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने दुमका के तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त (डिविजनल कमिश्नर) द्वारा 19 अक्टूबर 2015 को सौंपी गई रिपोर्ट का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने पाया कि कमिश्नर की गंभीर रिपोर्ट के बावजूद राज्य सरकार ने दोषियों पर कोई प्रभावी और ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की। रिपोर्ट सामने आने के बाद पाकुड़ के तत्कालीन उपायुक्त (DC) सुनील कुमार के खिलाफ केवल कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी करके खानापूर्ति कर ली गई और फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी गई। अदालत ने सरकार के इस ढुलमुल रवैये और जवाब को पूरी तरह अपर्याप्त मानते हुए एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच एजेंसी की जरूरत बताई और जांच का जिम्मा ACB को सौंप दिया।
5 नवंबर तक कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश
करीब एक दशक (2015 से) से लंबित इस चर्चित खनन विवाद में निर्णायक कार्रवाई न होने को लेकर अदालत पहले भी अपनी तल्ख टिप्पणियां दर्ज करा चुकी है। अब हाईकोर्ट के सीधे हस्तक्षेप और एसीबी जांच के आदेश से इस कथित महाघोटाले में शामिल खनन माफियाओं, कंपनी प्रबंधन और लापरवाही बरतने वाले तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
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