सदर अस्पताल बना ‘घर-आंगन’ का खेल? ड्यूटी टाइम में निजी क्लीनिक पर मरीज देखने के आरोप
सदर अस्पताल एवं मेदनी राय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल परिसर से चंद कदमों की दूरी पर सरकारी चिकित्सकों के नाम की प्लेट लगे निजी क्लीनिक, स्वास्थ्य विभाग के 500 मीटर एवं 250 मीटर के प्रावधान को लेकर उठे सवाल

Jharkhand... news.. मेदिनीनगर सदर अस्पताल में कार्यरत कुछ चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि निर्धारित ड्यूटी एवं ओपीडी समय के दौरान कुछ सरकारी चिकित्सक निजी क्लीनिकों में मरीजों को देखते हैं। मामला इसलिए भी गंभीर है कि सदर अस्पताल एवं संचालित मेदनी राय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल परिसर से महज चंद कदमों की दूरी पर कथित तौर पर सरकारी चिकित्सकों के नाम की प्लेट लगे निजी क्लीनिक संचालित होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि संबंधित चिकित्सक वास्तव में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं और उनके नाम का इस्तेमाल निजी क्लीनिक के बोर्ड पर किया जा रहा है, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित चिकित्सकों को है? यदि जानकारी है, तो क्या संबंधित चिकित्सकों ने ऐसे क्लीनिकों के संचालकों के विरुद्ध कोई आपत्ति या कानूनी कार्रवाई की है? स्वास्थ्य विभाग के 15 जुलाई 2016 के सर्कुलर का प्रावधान मामले में स्वास्थ्य विभाग के Letter/Circular No. 3/Stha. D-01-166/15-666(3), दिनांक 15 जुलाई 2016 का उल्लेख महत्वपूर्ण है। झारखंड हाईकोर्ट के विभिन्न मामलों में इस सर्कुलर के प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि सरकारी चिकित्सक अपने निर्धारित ड्यूटी समय तथा ओपीडी के समय निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते। न्यायिक रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि ड्यूटी के बाहर निजी प्रैक्टिस की अनुमति की स्थिति में भी सरकारी अस्पताल के शहरी क्षेत्र में 500 मीटर तथा ग्रामीण क्षेत्र में 250 मीटर के दायरे में निजी प्रैक्टिस पर रोक का प्रावधान है। सर्कुलर के जिस प्रावधान का उल्लेख न्यायिक रिकॉर्ड में हुआ है, उसके अनुसार सरकारी चिकित्सक किसी निजी अस्पताल, नर्सिंग होम अथवा डायग्नोस्टिक सेंटर में सेवा नहीं दे सकते तथा सरकारी अस्पताल से निर्धारित दूरी के भीतर निजी प्रैक्टिस पर भी रोक का उल्लेख है। ऐसे में यदि सदर अस्पताल जैसे शहरी क्षेत्र के सरकारी अस्पताल से 500 मीटर के दायरे के भीतर किसी सरकारी चिकित्सक का निजी क्लीनिक संचालित हो रहा है अथवा वहां संबंधित सरकारी चिकित्सक निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं, तो यह जांच का विषय है। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों के संदर्भ में 250 मीटर की सीमा का प्रावधान महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या अस्पताल प्रबंधन को जानकारी नहीं? सदर अस्पताल एवं मेदनी राय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल परिसर से चंद कदमों की दूरी पर यदि सरकारी चिकित्सकों के नाम की प्लेट लगे क्लीनिक संचालित हो रहे हैं, तो सवाल यह भी है कि क्या इसकी जानकारी अस्पताल प्रबंधन अथवा सिविल सर्जन को है? यदि जानकारी है तो क्या संबंधित क्लीनिकों की जांच कराई गई? क्या यह सत्यापित किया गया कि वहां वास्तव में संबंधित सरकारी चिकित्सक मरीज देखते हैं या उनके नाम/पंजीकरण का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति या संस्था द्वारा किया जा रहा है? कहीं सरकारी चिकित्सकों के नाम या पंजीकरण का इस्तेमाल तो नहीं? यह भी जांच का विषय है कि निजी क्लीनिकों पर लगाए गए नाम-प्लेट वास्तविक रूप से संबंधित चिकित्सकों द्वारा अधिकृत हैं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी निजी क्लीनिक या संस्थान द्वारा सरकारी चिकित्सक के नाम अथवा पंजीकरण का इस्तेमाल अपनी चिकित्सा सेवाओं के प्रचार अथवा संचालन के लिए किया जा रहा है? यदि ऐसा है तो संबंधित चिकित्सक का पक्ष भी लिया जाना चाहिए और क्लीनिक संचालक से भी दस्तावेजों के आधार पर स्पष्टीकरण लिया जाना चाहिए। वेबकैम आधारित निगरानी व्यवस्था क्यों नहीं? मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों एवं कर्मियों की उपस्थिति और ड्यूटी के दौरान उनकी उपलब्धता की निगरानी से भी जुड़ा है। क्या सभी विभागों के लिए एक केंद्रीकृत वेबकैम आधारित कंट्रोल पैनल विकसित नहीं किया जा सकता, जिससे अस्पताल के विभिन्न विभागों एवं कार्यालयों में अधिकृत आवाजाही और उपस्थिति की निगरानी की जा सके? जब भारत निर्वाचन आयोग दूरस्थ एवं संवेदनशील मतदान केंद्रों तक वेबकैम आधारित निगरानी की व्यवस्था कर सकता है, तो स्वास्थ्य विभाग के महत्वपूर्ण अस्पतालों में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता? हालांकि ऐसी व्यवस्था लागू करते समय मरीजों की चिकित्सकीय गोपनीयता और निजता का पूरा ध्यान रखना भी आवश्यक होगा। निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई मरीजों और उनके परिजनों के लिए सरकारी अस्पताल में चिकित्सकों की समय पर उपलब्धता और गुणवत्तापूर्ण उपचार सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कोई चिकित्सक सरकारी ड्यूटी या ओपीडी के निर्धारित समय में निजी क्लीनिक में मरीज देखता पाया जाता है, तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय हो सकता है। वहीं, यदि किसी निजी क्लीनिक द्वारा किसी सरकारी चिकित्सक के नाम अथवा पंजीकरण का बिना अनुमति इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह भी जांच का विषय है। ऐसे में ड्यूटी रोस्टर, ओपीडी समय, चिकित्सकों की वास्तविक उपस्थिति, संबंधित क्लीनिकों की दूरी, वहां लगे नाम-प्लेट तथा क्लीनिक में मरीज देखने वाले चिकित्सकों की पहचान की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। आरोप सही पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई और आरोप गलत पाए जाने पर संबंधित चिकित्सकों को स्पष्ट रूप से क्लीन चिट दिया जाना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल—सरकारी अस्पताल में निर्धारित ड्यूटी का समय मरीजों के इलाज और सेवा के लिए है या निजी क्लीनिक में मरीज देखने के लिए?
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