‘विरासत’ पर घमासान के बाद उपेंद्र कुशवाहा का पलटवार, बोले- ‘कुर्सी नहीं, विचारों की बात कर रहा हूं’
नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर शुरू हुए विवाद के बीच उपेंद्र कुशवाहा ने सफाई दी है। उन्होंने कहा कि ‘विरासत’ का मतलब सत्ता या सरकारी पद नहीं, बल्कि पूर्वजों के विचारों और मूल्यों को आगे बढ़ाना है।


पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बयान पर जेडीयू की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आने के बाद अब कुशवाहा ने अपनी बात फिर स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग शायद ‘विरासत’ शब्द का अर्थ ठीक से नहीं समझ पाए।
राजगीर में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान कुशवाहा ने कहा था कि नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से फुर्सत लेने के बाद उनकी विरासत को राष्ट्रीय लोक मोर्चा आगे बढ़ाएगी। इस बयान के बाद जेडीयू नेताओं ने उन पर निशाना साधा और उनकी राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठाए।
‘विरासत का मतलब सरकारी पद नहीं’
जेडीयू के हमलों के बाद कुशवाहा ने सफाई देते हुए कहा कि विरासत का मतलब किसी सरकारी पद, सत्ता या कुर्सी पर दावा करना नहीं है। उन्होंने कहा, “विरासत का मतलब कोई सरकारी पद नहीं होता है। हमारे पूर्वजों ने जो हमें सिखाया है, उनकी जो सीख है, उस सोच को आगे बढ़ाना ही विरासत है।” कुशवाहा के मुताबिक, किसी नेता की विरासत को सत्ता से जोड़कर देखने के बजाय उसके विचारों और मूल्यों को आगे बढ़ाने के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
JDU के ‘चादर’ और ‘पंचर गाड़ी’ वाले तंज का जवाब
कुशवाहा के शुरुआती बयान के बाद जेडीयू की ओर से उन पर राजनीतिक तंज कसे गए थे। नेताओं ने इशारों में कहा कि कुछ लोगों को अपनी ‘चादर’ देखकर पैर फैलाना चाहिए। वहीं, राजनीतिक संतुलन को लेकर उन्हें ‘पंचर गाड़ी’ जैसा तंज भी सुनना पड़ा। अब कुशवाहा ने सीधे तौर पर जवाब देने के बजाय ‘विरासत’ की अपनी व्याख्या सामने रखी है।
कर्पूरी और लोहिया की विचारधारा का भी जिक्र
RLM प्रमुख ने कहा कि उनकी पार्टी कर्पूरी ठाकुर और राममनोहर लोहिया की विचारधारा को आगे बढ़ाने का दावा करती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि केवल उनकी पार्टी ही इस विरासत की वाहक है। उन्होंने कहा कि अगर दूसरी राजनीतिक पार्टियां भी इन विचारों को आगे बढ़ाती हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए।
कुशवाहा ने कहा, “हम भी उस विरासत को आगे बढ़ाएंगे, आप भी आगे बढ़ाइए और सभी लोग मिलकर उसे आगे बढ़ाएं। चिंता सिर्फ इतनी होनी चाहिए कि विरासत रुके नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती रहे।” बिहार की राजनीति में असली सवाल अब यही है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक और वैचारिक विरासत को आगे कौन बढ़ाएगा?
जेडीयू खुद को नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानती है, जबकि कुशवाहा इसे व्यापक सामाजिक और वैचारिक संदर्भ में पेश कर रहे हैं। फिलहाल ‘विरासत’ शब्द ने बिहार की सियासत में नई बहस जरूर छेड़ दी है। कुशवाहा की सफाई के बावजूद यह देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू इस बयान पर आगे क्या प्रतिक्रिया देती है।

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