नाबालिगों से जुड़े केसों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर!, झारखंड के 24 जिलों से मांगा 7 साल का पूरा डेटा
झारखंड में नाबालिगों से जुड़े अपराधों और POCSO एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट ने बेहद सख्त तेवर अपना लिए हैं।
Suprem Court Of India: झारखंड में नाबालिगों से जुड़े अपराधों और POCSO एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट ने बेहद सख्त तेवर अपना लिए हैं। न्यायपालिका के कड़े निर्देशों के बाद राज्य का सीआईडी और पुलिस मुख्यालय पूरी तरह एक्टिव हो गया है। बच्चों से जुड़े कानूनी मामलों की स्थिति, उनकी सोशल रिपोर्ट और पुलिस विभाग के मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का पूरा हिसाब-किताब राज्य के सभी 24 जिलों से तलब किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाएगी पूरी रिपोर्ट
यह पूरी कवायद झारखंड हाई कोर्ट की जुवेनाइल जस्टिस सह POCSO कमेटी के निर्देश पर शुरू की गई है। जिलों से यह सारा डेटा एक तय एक्सेल फॉर्मेट के तहत सॉफ्ट और हार्ड कॉपी में मांगा गया है, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा। इस बड़े डेटा कलेक्शन को सीआईडी ने अलग-अलग हिस्सों में बांटकर जिलों से जवाब मांगा है।
संसाधनों और पुलिस ट्रेनिंग का ब्योरा तलब
पहले हिस्से में 1 जुलाई 2025 से 30 जून 2026 तक के संस्थागत ढांचे की रिपोर्ट मांगी गई है। इसमें जिलों से पूछा गया है कि उनके यहाँ जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) में कितने स्पेशल जज तैनात हैं और बच्चों के लिए अलग से कितनी चिल्ड्रन्स कोर्ट चल रही हैं। इसके अलावा स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट, तैनात सोशल वर्कर्स, प्रोबेशन अफसरों की मौजूदा संख्या और बच्चों के मामलों से जुड़ी खास इंडक्शन ट्रेनिंग ले चुके पुलिस अधिकारियों का पूरा आंकड़ा भी मुख्यालय को देना होगा।
7 साल की सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट पर पैनी नजर
दूसरे हिस्से में कानून के घेरे में आए बच्चों की पृष्ठभूमि और उनके सुधार से जुड़ी रिपोर्ट का हिसाब मांगा गया है। जिलों को 1 जनवरी 2019 से लेकर 30 जून 2026 तक का साल-दर-साल डेटा देना होगा। इसमें अपराध की गंभीरता और श्रेणियों के आधार पर तैयार की गई सोशल बैकग्राउंड रिपोर्ट की पूरी जानकारी शामिल होगी।
कमियां दूर कर न्याय प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी
अदालत और पुलिस मुख्यालय की इस संयुक्त पहल का सीधा मकसद राज्य के भीतर बाल न्याय प्रणाली को जमीन पर असरदार बनाना है। इस डेटा से साफ हो सकेगा कि किस जिले में इंफ्रास्ट्रक्चर या स्टाफ की कमी है, ताकि उस गैप को भरकर नाबालिगों से जुड़े संवेदनशील मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सके।
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