7 साल तक संबंध दुष्कर्म नहीं, आपसी सहमति!, झारखंड हाईकोर्ट ने रद्द की रेप की FIR
झारखंड हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और निचली अदालत की पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए आरोपी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और निचली अदालत की पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से यह साफ जाहिर होता है कि दोनों पक्षों के बीच सात साल तक चला यह रिश्ता पूरी तरह आपसी सहमति (कंसेंट) पर आधारित था। कोर्ट ने कहा कि शादी से इनकार कर देने मात्र से इतने लंबे समय के सहमति वाले संबंध को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
शादी समारोह से शुरू हुआ था प्रेम प्रसंग
यह मामला गिरिडीह महिला (सदर) थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। दर्ज शिकायत के मुताबिक, याचिकाकर्ता लालू महथा और शिकायतकर्ता महिला की पहली मुलाकात साल 2016 में एक शादी समारोह के दौरान हुई थी। वहीं दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई, मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हुआ और धीरे-धीरे यह दोस्ती गहरे प्रेम संबंध में बदल गई।
सात साल तक रहे संबंध, शादी से इनकार पर दर्ज कराई FIR
महिला ने आरोप लगाया था कि लालू महथा ने उससे शादी करने का वादा किया था और इसी वादे की आड़ में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। यह सिलसिला करीब सात वर्षों तक लगातार चलता रहा। महिला का कहना था कि जब भी वह शादी करने का दबाव बनाती, आरोपी कोई न कोई बहाना बनाकर बात को टाल देता था। आखिरकार जब आरोपी और उसके परिजनों ने शादी के रिश्ते से पूरी तरह मना कर दिया, तब जाकर महिला ने गिरिडीह महिला थाने में दुष्कर्म की धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
सहमति से बने रिश्ते में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और मामले के तथ्यों की समीक्षा करने के बाद पाया कि दोनों बालिग थे और उनके बीच सात वर्ष से अधिक समय तक लगातार शारीरिक संबंध रहे। अदालत ने रेखांकित किया कि एफआईआर दर्ज कराने की मुख्य वजह आरोपी और उसके परिवार द्वारा शादी से इनकार करना था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि प्राथमिकी में लगाए गए सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी सात साल की इतनी लंबी अवधि यह साबित करती है कि यह संबंध दोनों की रजामंदी से बना था। शादी का वादा पूरा न होने को जबरन शारीरिक संबंध या बलात्कार नहीं ठहराया जा सकता। इन तर्कों के साथ हाईकोर्ट ने लालू महथा के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी, निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान (Cognizance) आदेश और चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।
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