रिम्स में एचआईवी पॉजिटिव मरीज का ऑपरेशन: लापरवाही या रिपोर्ट का खेल?
राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में एक एचआईवी पॉजिटिव मरीज को निगेटिव मानकर ऑपरेशन किए जाने का मामला अब गहराता जा रहा है। जांच रिपोर्ट में देरी और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी ने इस पूरे प्रकरण को संदेह के घेरे में ला दिया है।

राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में एक एचआईवी पॉजिटिव मरीज को निगेटिव मानकर ऑपरेशन किए जाने का मामला अब गहराता जा रहा है। जांच रिपोर्ट में देरी और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी ने इस पूरे प्रकरण को संदेह के घेरे में ला दिया है। मामला केवल एक ऑपरेशन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और डायग्नोस्टिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विरोधाभासों का जाल: कब पॉजिटिव, कब निगेटिव? इस मामले में सबसे बड़ा पेंच मरीज की अलग-अलग लैब रिपोर्ट को लेकर है। तथ्यों के अनुसार: 31 अगस्त 2025: धुर्वा स्थित एक प्राइवेट लैब में मरीज की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। 20 सितंबर 2025: महज 20 दिन बाद सदर अस्पताल की जांच में रिपोर्ट नॉन-रिएक्टिव (निगेटिव) निकली। दिसंबर 2025: सदर अस्पताल में मरीज फिर से पॉजिटिव पाया गया। सवाल यह उठता है कि यदि कोई अगस्त में पॉजिटिव था, तो 20 दिनों के भीतर वह 'नॉन-रिएक्टिव' कैसे हो सकता है? क्या सरकारी लैब की टेस्टिंग किट या प्रक्रिया में कोई खामी थी? रिम्स की भूमिका और सुरक्षा पर सवाल चौंकाने वाली बात यह है कि रिम्स ने मरीज की पर्ची पर अंकित किया था कि वह 3 साल से पॉजिटिव है और दवा ले रहा है। इसके बावजूद ऑपरेशन से पहले अनिवार्य 'सेरोलॉजी टेस्ट' क्यों नहीं किया गया? इस लापरवाही ने न केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया, बल्कि उन जूनियर डॉक्टरों के जीवन को भी खतरे में डाल दिया, जिन्हें सर्जरी के दौरान सुई चुभी थी। मेडिकल जगत में यह स्थापित नियम है कि किसी भी सर्जरी से पहले संक्रमण की जांच अनिवार्य है, जिसे यहाँ नजरअंदाज किया गया। स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी और संभावित खतरा वर्तमान में रिम्स, सदर अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग इस संवेदनशील मामले को ठंडे बस्ते में डालते दिख रहे हैं। अब तक किसी जांच कमेटी ने स्पष्ट निष्कर्ष साझा नहीं किया है। यह मामला एक चेतावनी है। क्या गलत रिपोर्ट के आधार पर ऑपरेशन होना अब सामान्य बात हो जाएगी? यदि मरीज डॉक्टरों को गुमराह कर रहे हैं या सिस्टम रिपोर्ट की सत्यता नहीं परख पा रहा, तो यह स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक बड़ा 'रेड फ्लैग' है। विभाग को तुरंत स्पष्ट करना चाहिए कि मरीज असल में कब संक्रमित हुआ और इस भारी चूक के लिए जिम्मेदार कौन है।
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