Strait of Hormuz पर ईरान का एक्शन, क्या भारत पर आने वाला है तेल संकट?
ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर आवाजाही रोकने की खबर के बाद वैश्विक तेल बाजार में हलचल बढ़ गई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है, ऐसे में इस समुद्री मार्ग पर बढ़ता तनाव तेल की कीमतों, महंगाई और देश की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक बार फिर दुनिया की नजर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) पर टिक गई है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव के बाद इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में संभावित व्यवधान की आशंका जताई जा रही है। इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। खाड़ी क्षेत्र के कई प्रमुख तेल उत्पादक देश अपने तेल और गैस निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचाते हैं। वैश्विक स्तर पर होने वाले तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इस समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की बाधा का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
ताजा घटनाक्रम से क्यों बढ़ी चिंता?
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ा है। इसी पृष्ठभूमि में ईरान की ओर से होर्मुज क्षेत्र में सख्त कदम उठाने की चेतावनी दी गई, जिसके बाद तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई। निवेशकों को आशंका है कि यदि लंबे समय तक समुद्री यातायात प्रभावित रहा तो वैश्विक स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसी डर के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया।
भारत पर कितना पड़ सकता है असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों में शामिल है और अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन की लागत बढ़ सकती है। इसका प्रभाव परिवहन, उद्योग और आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी पड़ सकता है। साथ ही महंगाई बढ़ने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है। रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से तेल खरीद बढ़ने के कारण किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है। इसके बावजूद खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है।
फिलहाल स्थिति पर भारत सरकार और ऊर्जा क्षेत्र की एजेंसियां लगातार नजर बनाए हुए हैं। जानकारों का मानना है कि तत्काल किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है, लेकिन यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। आने वाले दिनों में क्षेत्र की परिस्थितियां यह तय करेंगी कि बाजार में स्थिरता लौटती है या दुनिया को एक नए ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ता है।
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