"मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता" : बच्चों के असली राष्ट्रपति की एक रोचक कहानी
साल 2002 की बात है. डॉ. कलाम को भारत का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया गया था. उसी दिन उन्हें एक छात्र सम्मेलन में भाषण देने जाना था, जो पहले से तय था. सुरक्षा अधिकारी और मंत्रालय के लोग कहने लगे, "सर, अब आप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, कार्यक्रम रद्द कर देते हैं....

विश्व छात्र दिवस विशेष
छात्रों सहित पूरे भारत के सबसे चहेते राष्ट्रपति की जयंती के उपलक्ष्य में विश्व छात्र दिवस को वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त है. छात्रों से उन्हें गहरा लगाव था. आए दिन अपने कार्यकाल के दौरान या कार्यकाल के बाद, जब भी कलाम सर को मौका मिलता वे छात्रों से रूबरू हुआ करते. विद्यार्थियों को भी उनसे मुखातिब होकर बहुत प्रेरणा मिलती थी.
एक कहानी हम यहां साझा कर रहे हैं, जो कलाम सर के साधारण और प्रेरणादायक व्यक्तित्व की ही मिसाल है :
“राष्ट्रपति बनूंगा या नहीं, ये बाद की बात है..”
साल 2002 की बात है. डॉ. कलाम को भारत का राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव दिया गया था. उसी दिन उन्हें एक छात्र सम्मेलन में भाषण देने जाना था, जो पहले से तय था. सुरक्षा अधिकारी और मंत्रालय के लोग कहने लगे, "सर, अब आप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं, कार्यक्रम रद्द कर देते हैं."
लेकिन कलाम सर ने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति बनूंगा या नहीं, ये बाद की बात है. लेकिन जिन बच्चों ने मुझसे मिलने का सपना देखा है, मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता." और वे उसी दिन उस छोटे से स्कूल में पहुंचे, जहां सैकड़ों बच्चे उनका इंतज़ार कर रहे थे.
बच्चों के साथ 2 घंटे बिताए, सवाल-जवाब किए, उन्हें सपने देखने और बड़ा सोचने की प्रेरणा दी. फिर चुपचाप वापस लौटे और राष्ट्रपति बनने की प्रक्रिया में शामिल हुए.
ये कहानी हमें बताती है कि कलाम सर के लिए 'पद' से ज़्यादा महत्वपूर्ण था 'विद्यार्थियों का सपना'. यही बनाता है उन्हें 'बच्चों का असली राष्ट्रपति'.
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