पीछे टंगे हैं गोल्ड मेडल और आगे सब्जी तौल रहे हाथ, रांची के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अमरदीप का सब्जी बेचते Video वायरल
अमरदीप ने साल 2013 में बिना किसी बड़े सपोर्ट सिस्टम के थ्रोबॉल खेलना शुरू किया था। अपनी कड़ी मेहनत के दम पर साल 2015 में उनका चयन जूनियर एशियाई चैंपियनशिप के लिए हुआ, जहां उन्होंने शानदार खेल दिखाते हुए भारत को गोल्ड मेडल दिलाया।

Naxatra Digital Desk: रांची के अरगोड़ा चौक पर सब्जी बेचते एक युवक का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। वीडियो में दिख रहा युवक कोई आम दुकानदार नहीं, बल्कि देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोल्ड मेडल जीत चुके थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार हैं। दुकान में एक तरफ अमरदीप ग्राहकों के लिए सब्जियां तौल रहे हैं, तो ठीक पीछे की दीवार पर देश और राज्य के लिए जीते गए कई मेडल टंगे नजर आ रहे हैं। यह वीडियो खेल संघों और सरकारी दावों के बीच खिलाड़ियों की बदहाली की असली तस्वीर बयां कर रहा है।
2015 से 2026 तक देश को दिलाए कई स्वर्ण पदक
अमरदीप ने साल 2013 में बिना किसी बड़े सपोर्ट सिस्टम के थ्रोबॉल खेलना शुरू किया था। अपनी कड़ी मेहनत के दम पर साल 2015 में उनका चयन जूनियर एशियाई चैंपियनशिप के लिए हुआ, जहां उन्होंने शानदार खेल दिखाते हुए भारत को गोल्ड मेडल दिलाया। इसके बाद भी उनका शानदार सफर जारी रहा। इसी साल जून 2026 में नेपाल की जगह रांची में आयोजित हुई सीनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप में भी अमरदीप ने भारतीय टीम की तरफ से खेलते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
कर्ज लेकर बेटे को प्रतियोगिताओं में भेजते रहे माता-पिता
जीत और पदकों की इस चमक के पीछे परिवार का भारी आर्थिक संघर्ष छिपा है। अमरदीप के माता-पिता आज भी सब्जी बेचकर ही पूरे परिवार का पेट पालते हैं। पिता का कहना है कि बेटे को देश-विदेश की प्रतियोगिताओं में भेजने के लिए परिवार को कई बार लोगों से भारी कर्ज तक लेना पड़ा। परिवार ने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की और अमरदीप ने भी गोल्ड जीतकर भरोसा कायम रखा, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई ठोस और स्थायी आर्थिक मदद नहीं मिल सकी।
'ओलंपिक खेल नहीं' कहकर पल्ला झाड़ रहा विभाग
आर्थिक तंगी से जूझ रहे अमरदीप ने झारखंड सरकार और खेल निदेशालय से मदद की गुहार लगाई है। अमरदीप का कहना है कि विभागीय अधिकारी अक्सर यह कहकर बात टाल देते हैं कि थ्रोबॉल एक ओलंपिक खेल नहीं है, इसलिए इसे प्राथमिकता नहीं दी जाती। वहीं दूसरी ओर, खेल निदेशालय का कहना है कि गैर-ओलंपिक खेलों के लिए भी कुछ नियम हैं और खिलाड़ियों को किस तरह लाभ पहुंचाया जा सकता है, इस पर विचार चल रहा है।
मुश्किल हालात के बीच भी खेल जारी रखने का हौसला
हाथ में तराजू होने के बावजूद अमरदीप का जज्बा टूटा नहीं है। वे परिवार की मदद के साथ-साथ अपनी ट्रेनिंग भी जारी रखे हुए हैं ताकि आगे भी तिरंगा लहरा सकें। अमरदीप की यह कहानी खेल व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सीधा सवाल खड़ा करती है कि जब कोई खिलाड़ी तिरंगे की शान बढ़ा रहा हो, तो उसे अपने हक और सरकारी मदद के लिए सालों तक इंतजार क्यों करना पड़े।
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