पत्नी के इलाज का क्लेम अटकाना पड़ा भारी!, उपभोक्ता आयोग ने SBI जनरल इंश्योरेंस पर लगाया 1.32 लाख का जुर्माना
पश्चिमी सिंहभूम उपभोक्ता आयोग ने पत्नी के इलाज का बीमा क्लेम नहीं चुकाने पर SBI जनरल इंश्योरेंस को सेवा में कमी का दोषी ठहराया। कंपनी को 1,32,572 रुपये देने होंगे, देरी पर 9% ब्याज लगेगा।

SBI General Insurance : पत्नी के इलाज में हुए खर्च की बीमा राशि का भुगतान न करने के मामले में पश्चिमी सिंहभूम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने बुधवार को एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में कमी (Deficiency in service) का दोषी ठहराया। शिकायतकर्ता महेंद्र रजक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आयोग ने बीमा कंपनी को वास्तविक क्लेम राशि 82,572 रुपये, मानसिक प्रताड़ना और परेशानी के एवज में 40 हजार रुपये तथा वाद व्यय (मुकदमा खर्च) के रूप में 10 हजार रुपये देने का आदेश दिया है। कंपनी को कुल 1,32,572 रुपये का भुगतान करना होगा।
45 दिनों के भीतर करना होगा भुगतान, नहीं तो लगेगा 9% ब्याज
जिला उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि आदेश जारी होने की तिथि से 45 दिनों के भीतर इस पूरी राशि का भुगतान शिकायतकर्ता को करना अनिवार्य होगा। यदि निर्धारित अवधि के भीतर राशि नहीं दी जाती है, तो बीमा कंपनी को कुल देय राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी चुकाना पड़ेगा। यह मामला आयोग में दर्ज वाद संख्या 28/2025 से जुड़ा था, जिसकी शुरुआत 16 जुलाई 2025 को हुई थी। 22 अगस्त 2026 को अंतिम बहस पूरी होने के बाद आयोग ने 2 सितंबर 2026 को यह अंतिम फैसला सुनाया।
आरोग्य प्लस पॉलिसी होने के बावजूद कंपनी ने नकारा था क्लेम
मामले के अनुसार, महेंद्र रजक ने अपने और पूरे परिवार के लिए एसबीआई जनरल इंश्योरेंस की ‘आरोग्य प्लस स्वास्थ्य बीमा योजना’ ले रखी थी, जिसकी वैधता 13 फरवरी 2024 से 12 फरवरी 2025 तक थी। पॉलिसी प्रभावी रहने के दौरान ही उनकी पत्नी कलावती देवी की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें 16 से 22 अक्टूबर 2024 तक गुरुनानक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज में कुल 82,572 रुपये खर्च हुए। शिकायतकर्ता ने इलाज के सभी वैध दस्तावेज, डिस्चार्ज समरी और बिल कंपनी को सौंपे, लेकिन कंपनी ने पहले अस्पताल को पत्र भेजकर कैशलेस सुविधा देने से इनकार किया और बाद में रिइंबर्समेंट क्लेम का भी निपटारा नहीं किया।
आयोग ने खारिज की कंपनी की दलील, सेवा में कमी करार
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया था कि शिकायतकर्ता ने उनके समक्ष विधिवत क्लेम प्रस्तुत नहीं किया था और आयोग में शिकायत समय से पहले दर्ज कराई गई। हालांकि, फोरम ने कंपनी की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि रिकॉर्ड में क्लेम नंबर दर्ज होने और सभी जरूरी कागजात मौजूद होने के बावजूद बीमा कंपनी ने दावे का सही तरीके से परीक्षण नहीं किया और कोई स्पष्ट निर्णय दिए बिना मामले को अटकाए रखा। इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए उपभोक्ता आयोग ने पीड़ित के हक में फैसला सुनाया।
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