AYODHYA: अयोध्या को भारत की सबसे प्राचीन और सात पवित्र नगरियों में गिना जाता है. हिंदू धर्म के अनुसार यहीं त्रेता युग में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ. स्कंद पुराण, वाल्मीकि रामायण और अनेक प्राचीन ग्रंथ अयोध्या को राम जन्मभूमि के रूप में उल्लेखित करते हैं. सदियों से यहां रामलला की पूजा होती रही है, जो इस भूमि की निरंतर धार्मिक परंपरा को दर्शाती है.
मंदिर के स्थान पर संरचना बदलने का उल्लेख
कई ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक निष्कर्षों में यह बात सामने आई है कि 16वीं शताब्दी में मुगल शासनकाल के दौरान राम मंदिर के स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण हुआ. स्थानीय परंपराओं और विदेशी यात्रियों के लेखन में भी यह विवाद दर्ज मिलता है. समय के साथ यह स्थान आस्था और इतिहास दोनों का केंद्र बना रहा.
19वीं–20वीं सदी: संघर्ष और कानूनी लड़ाइयां
1857 के आसपास विवाद पहली बार कानूनी स्वरूप में उभरा. 1885 में महंत रघुवीर दास ने अदालत में पूजा स्थल के अधिकार को लेकर याचिका दायर की, हालांकि उन्हें निर्माण की अनुमति नहीं मिली. इसके बाद मंदिर–मस्जिद विवाद लगातार बढ़ता गया और 1949 में गर्भगृह में रामलला की मूर्ति प्रकट होने की घटना ने मामले को नए दौर में पहुंचा दिया. इसके बाद से स्थल पर पूजा जारी रही और सरकार ने क्षेत्र को विवादित घोषित कर दिया.
आधुनिक काल का निर्णायक इतिहास
1992 में ढांचा ढह जाने के बाद मामला देशव्यापी मुद्दा बन गया. लंबे समय तक सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवम्बर 2019 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पूरी विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया और मुस्लिम पक्ष को पांच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया. इस निर्णय को आधुनिक भारत के न्यायिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है.
राम मंदिर का नया युग
भूमिपूजन 5 अगस्त 2020 को हुआ और आधुनिक तकनीक व प्राचीन स्थापत्य कला के संगम से भव्य मंदिर का निर्माण तेजी से आगे बढ़ा. 22 जनवरी 2024 को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह पूरे विश्व में श्रद्धा का केंद्र बना, जिसने अयोध्या को एक बार फिर हिंदू आस्था के सर्वोच्च स्थल के रूप में स्थापित कर दिया.
भव्य ध्वजारोहण
25 नवंबर 2025 को राम लला मंदिर, अयोध्या में भव्य ध्वज फहराया गया. ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और सीएम योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे.










