छोटानागपुर काश्तकारी कानून का उल्लंघन नहीं चलेगा!, पूर्वी सिंहभूम जमीन बहाली मामले में निचली अदालतों के फैसले पर हाईकोर्ट की मुहर
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे इस जमीन पर साल 1967 से काबिज हैं। उनका दावा था कि 1967 में दायर एक टाइटल सूट में आपसी समझौते (कॉम्प्रोमाइज डिक्री) के तहत उन्हें यह कब्जा मिला था।

Jharkhand High Court : पूर्वी सिंहभूम जिले के देवघर मौजा में जमीन बहाली से जुड़े एक पुराने मामले में झारखंड हाईकोर्ट से याचिकाकर्ताओं को बड़ा झटका लगा है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने निचली अदालतों के आदेशों को पूरी तरह सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं की अर्जी खारिज कर दी। इस फैसले के बाद छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की धारा 71-ए के तहत जमीन की वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
LRDC से लेकर कमिश्नर तक से खारिज हो चुकी थी अपील
यह पूरा मामला धालभूम के भूमि सुधार उप समाहर्ता (LRDC) के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने CNT एक्ट की धारा 71-ए का इस्तेमाल करते हुए जमीन को मूल मालिकों को वापस लौटाने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने पहले उपायुक्त (DC) और फिर प्रमंडलीय आयुक्त के पास अपील की, लेकिन दोनों ही जगहों से उनकी पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
याचिकाकर्ताओं का दावा: 1967 से है कब्जा
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वे इस जमीन पर साल 1967 से काबिज हैं। उनका दावा था कि 1967 में दायर एक टाइटल सूट में आपसी समझौते (कॉम्प्रोमाइज डिक्री) के तहत उन्हें यह कब्जा मिला था। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इतने लंबे समय से चले आ रहे कब्जे के कारण अब धारा 71-ए के तहत जमीन वापसी की कार्रवाई की समयावधि (लिमिटेशन पीरियड) खत्म हो चुकी है।
कोर्ट में क्यों टिका नहीं याचिकाकर्ताओं का तर्क?
राज्य सरकार और विपक्षी पक्ष ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों का जोरदार विरोध किया। कोर्ट को बताया गया कि 1968 की समझौता डिक्री के आधार पर काफी सालों बाद म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) कराया गया था और जमीन के कागजात भी इसी समय के हैं। सबसे मुख्य बात यह थी कि इस तरह का समझौता डिक्री छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के नियमों और प्रावधानों के पूरी तरह खिलाफ था। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद माना कि CNT एक्ट का उल्लंघन करके लिया गया कब्जा वैध नहीं ठहराया जा सकता और याचिका खारिज कर दी।
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