असम में Hemant Soren का चुनावी शंखनाद, आदिवासी अधिकार और शिक्षा को बनाया मुख्य मुद्दा
असम चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपनी रणनीति तेज कर दी है. पार्टी ने आदिवासी अधिकार, शिक्षा और सामाजिक न्याय को मुद्दा बनाते हुए चुनावी मैदान में मजबूती से उतरने का संकेत दिया.

Hemant from Assam: असम में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने भी अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं. पार्टी के नेताओं ने असम में जनसभाओं के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है. इसी क्रम में झारखंड सीएम हेमंत सोरेन ने आज एक जनसभा को संबोधित किया.
आदिवासी मुद्दों पर सरकारों को घेरा
सभा को संबोधित करते हुए हेमंत सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज, जिसने देश और राज्यों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई, आज भी उपेक्षित है. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय जनता को पैसे बांटकर भ्रमित किया जाता है, लेकिन बाद में उनकी अनदेखी की जाती है.
नेताओं ने कहा कि “ये लोग देने वाले नहीं, बल्कि लेने वाले हैं. जब तक इनका स्वार्थ पूरा नहीं होता, ये जनता के लिए कुछ नहीं करते.”
शिक्षा और रोजगार को बताया सबसे बड़ा हथियार
JMM ने अपने भाषण में शिक्षा को सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि आदिवासी युवाओं को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए बेहतर अवसर मिलने चाहिए. पार्टी ने यह भी दावा किया कि झारखंड में उन्होंने ऐसा कानून बनाया है, जिसमें आदिवासी छात्रों की पढ़ाई का पूरा खर्च सरकार उठाती है. इसी मॉडल को असम में भी लागू करने की बात कही गई.
चुनावी लालच से सावधान रहने की अपील
हेमंत सोरेन ने जनता को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव के समय पैसे और लालच के जाल में न फंसें. इसे उन्होंने शिकारी के जाल से तुलना करते हुए कहा कि “दाना डालकर फंसाने की कोशिश की जाती है.”
संघर्ष और स्वाभिमान का दिया संदेश
उन्होंने अपने संबोधन में आदिवासी इतिहास और संघर्ष को याद करते हुए कहा कि यह समाज कभी गुलाम नहीं रहा और अब समय आ गया है कि अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर खड़ा हो.
साथ ही लोगों से अपील की कि वे शिक्षा को प्राथमिकता दें और अपने अधिकारों के लिए जागरूक बनें.
असम में JMM की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि पार्टी आदिवासी और मूलवासी मुद्दों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहती है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका चुनावी असर कितना पड़ता है.
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