झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला!, हलाला के बाद दोबारा निकाह से मना करना अपराध नहीं, किसी को जबरन शादी के लिए मजबूर नहीं कर सकते
झारखंड हाईकोर्ट ने हलाला के बाद पहले पति से दोबारा निकाह करने से जुड़े एक विवाद में बेहद अहम और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने हलाला के बाद पहले पति से दोबारा निकाह करने से जुड़े एक विवाद में बेहद अहम और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा है कि किसी भी इंसान को उसकी मर्जी के खिलाफ शादी के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर कोई शख्स दोबारा निकाह करने से मना कर देता है, तो केवल इस इनकार को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।
गिरिडीह से हाईकोर्ट तक पहुंचा निकाह का विवाद
यह पूरा मामला गिरिडीह जिले का है। यहां एक महिला ने अपने पहले पति से तलाक और दूसरे शख्स से शादी यानी हलाला की प्रक्रिया के बाद दोबारा अपने पूर्व पति से निकाह की ख्वाहिश जताई थी। जब पूर्व पति ने महिला से दोबारा निकाह करने से साफ मना कर दिया, तो महिला ने उसके खिलाफ थाने में आपराधिक केस दर्ज करा दिया। गिरफ्तारी की तलवार लटकती देख पूर्व पति ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया और अग्रिम जमानत की गुहार लगाई।
क्या दोबारा निकाह की कोई कानूनी मजबूरी है?
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत में जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो सबसे बड़ा कानूनी सवाल यही उठा कि क्या तलाक और दूसरी शादी के बाद पहले पति पर उसी महिला से दोबारा निकाह करने की कोई कानूनी बाध्यता बनती है। कोर्ट ने इस पहलू की बारीकी से समीक्षा की और पर्सनल लॉ व आपराधिक कानूनों के दायरे को परखा।
मर्जी के बिना शादी के लिए कानून में कोई जगह नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि तलाक के बाद किसी अन्य व्यक्ति से शादी करने के पश्चात पहले पति पर दोबारा उसी महिला से निकाह करने का कोई कानूनी दबाव नहीं बनाया जा सकता। मुस्लिम पर्सनल लॉ हो या देश का सामान्य आपराधिक कानून, कोई भी प्रावधान किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी के बंधन में बंधने के लिए बाध्य नहीं करता। अदालत ने कहा कि शादी से महज इनकार करने को किसी भी सूरत में जुर्म के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
पूर्व पति को मिली अग्रिम जमानत
तमाम तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी पूर्व पति को बड़ी राहत देते हुए उसकी अग्रिम जमानत मंजूर कर ली। अदालत ने 25-25 हजार रुपये के दो निजी मुचलकों पर उसे अग्रिम जमानत की सुविधा दी। इस फैसले ने कानूनन यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति की निजी रजामंदी के बिना उसे शादी के लिए विवश नहीं किया जा सकता और महज इनकार को आधार बनाकर किसी पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती।
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