झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला!, CNT एक्ट वाली जमीन पर पुराना कब्जा या म्यूटेशन वैध अधिकार की गारंटी नहीं, याचिका खारिज
झारखंड हाईकोर्ट ने आदिवासी रैयती जमीन के संरक्षण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।

Jharkhand High Cout: झारखंड हाईकोर्ट ने आदिवासी रैयती जमीन के संरक्षण को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में व्यवस्था दी है कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) के तहत सुरक्षित जमीन पर यदि कानून के खिलाफ कोई भी लेन-देन हुआ है, तो उस पर सालों पुराना कब्जा, पुराना अदालती समझौता या राजस्व रिकॉर्ड में हुआ म्यूटेशन भी अवैध कब्जे को कानूनी अधिकार नहीं दिला सकता। न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने पूर्वी सिंहभूम के चर्चित मामले में अनंता गौर की रिट याचिका को सिरे से खारिज करते हुए जमीन वापसी के पुराने प्रशासनिक आदेशों को पूरी तरह जायज ठहराया है।
1967 के समझौते और 35 साल पुराने कब्जे की दी थी दलील
पूरा विवाद पूर्वी सिंहभूम जिले के एमजीएम थाना अंतर्गत गौर डांगा मौजा की जमीन से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता अनंता गौर उर्फ अनंत कुमार प्रधान और ईशान गौर ने अदालत के समक्ष दावा किया था कि वे वर्ष 1967 से ही इस विवादित जमीन पर शांतिपूर्वक काबिज हैं। उन्होंने साल 1967 में दायर टाइटल सूट (संख्या 791/1967) में हुए आपसी समझौते का हवाला देते हुए कहा कि इसी डिक्री के आधार पर उनके नाम से जमीन का दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) हुआ और सरकार ने उनसे लगान की रसीदें भी काटीं। इसके साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि करीब 35 साल के लंबे अरसे के बाद जमीन वापसी (SAR) का मामला दर्ज किया गया, जो समय-सीमा के नियमों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि जमीन पर अब पक्का मकान बन चुका है और उसका स्वरूप बदलकर छप्परबंदी हो चुका है।
कानून से ऊपर नहीं हो सकता कोई भी समझौता
हाईकोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीएनटी एक्ट की धारा 71-A का मकसद आदिवासी समुदाय की जमीन को गैर-कानूनी हस्तांतरण से बचाना है। यदि मूल जमीन का लेन-देन ही कानून की मूल भावना और प्रावधानों के विपरीत था, तो किसी टाइटल सूट के समझौते या म्यूटेशन की आड़ लेकर उसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जा सकता। अदालत ने माना कि समय बीत जाने या जमीन पर निर्माण कर लेने भर से अवैध कब्जा वैध नहीं हो जाता।
बहाल रहेगा जमीन वापसी का आदेश
उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद भूमि सुधार उप समाहर्ता (LRDC), दालभूम द्वारा 29 जून 2006 को दिए गए मूल आदेश को मजबूती मिल गई है, जिसमें सीएनटी एक्ट की धारा 71-A के तहत जमीन को मूल आदिवासी रैयत को लौटाने का आदेश दिया गया था। इसके बाद प्रशासन स्तर पर हुए SAR अपील और रिवीजन खारिज करने के फैसलों पर भी हाईकोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है। इस फैसले के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि सीएनटी एक्ट के उल्लंघन के मामलों में दशकों पुराने दस्तावेज या रसीदें भी अवैध कब्जे को कानूनी सुरक्षा कवच नहीं दे पाएंगी।

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