रामगढ़ में 9.27 एकड़ जमीन के मुआवजे पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पुराना आदेश रद्द
झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले के गोला अंचल के डभातु गांव में 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़े छह मामलों में बड़ा फैसला सुनाया है।
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले के गोला अंचल के डभातु गांव में 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़े छह मामलों में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत की ओर से तय किए गए मुआवजे को रद्द कर दिया है। अब जमीन का मुआवजा उपलब्ध साक्ष्यों की दोबारा जांच के बाद नए सिरे से तय किया जाएगा।
न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की अदालत ने मामलों को वापस भूमि अधिग्रहण न्यायालय भेजते हुए चार महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है। यह समय सीमा हाईकोर्ट के आदेश की प्रति मिलने की तारीख से लागू होगी।
8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर पर उठे सवाल
मामला भैरवा जलाशय परियोजना के लिए डभातु गांव की जमीन अधिग्रहण से जुड़ा है। भूमि अधिग्रहण न्यायालय ने पहले के एक मामले के फैसले को आधार बनाते हुए संबंधित जमीन के लिए 8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर से मुआवजा तय किया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने इस दर को तय करते समय यह ठीक से स्पष्ट नहीं किया कि जिस पुराने मामले को आधार बनाया गया, उसकी जमीन और मौजूदा मामलों की जमीन की परिस्थितियां वास्तव में कितनी समान थीं।
2002 के 33 जमीन सौदों का भी पूरा विश्लेषण नहीं
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की समीक्षा में पाया कि निचली अदालत ने साल 2002 में हुए 33 भूमि सौदों का जिक्र तो किया, लेकिन जमीन के क्षेत्रफल और बिक्री कीमत का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए कुछ अहम दस्तावेजों, खासकर बिक्री चार्ट और वैल्यूएशन खतियान पर निचली अदालत ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
जमीन मालिकों ने कहा- बाजार कीमत ज्यादा थी
यह विवाद भैरवा जलाशय परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद शुरू हुआ था। अधिग्रहण की घोषणा 20 नवंबर 2003 को हुई थी और इसे 2 दिसंबर 2003 को जिला गजट में प्रकाशित किया गया था।
जमीन मालिकों ने तय मुआवजे को कम बताते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका दावा था कि जमीन की बाजार कीमत ज्यादा थी और उसकी उपजाऊ क्षमता, भविष्य में इस्तेमाल की संभावना और व्यावसायिक महत्व को मुआवजा तय करते समय सही तरीके से नहीं देखा गया।
जमीन मालिकों ने यह भी दलील दी थी कि डभातु की जमीन गोला शहर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है और आसपास बाजार, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, ब्लॉक कार्यालय, पावर स्टेशन, राष्ट्रीय राजमार्ग समेत कई जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं।
सरकार ने भी निचली अदालत के फैसले पर जताई आपत्ति
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया। सरकार का कहना था कि जमीन मालिक अधिग्रहण के समय लागू बाजार दर को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं दे सके थे।
दूसरी ओर, जमीन मालिकों ने आरोप लगाया कि साल 2002 में हुए कई भूमि सौदों में ज्यादा कीमत वाले सौदों को नजरअंदाज कर कम कीमत वाले सौदों को आधार बनाया गया।
रिकॉर्ड के दस्तावेज भी साफ नहीं थे
हाईकोर्ट ने निचली अदालत से आए रिकॉर्ड में दस्तावेजों की स्थिति पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि एक्सहिबिट-सी के कई पन्ने इतने छोटे आकार में थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था। वहीं एक्सहिबिट-डी भी साफ तरीके से पढ़ने योग्य नहीं था।
अदालत ने कहा कि निचली अदालत से रिकॉर्ड भेजते समय जरूरी दस्तावेज स्पष्ट और उचित रूप में उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
2012 का फैसला और अवॉर्ड रद्द
इन कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 29 फरवरी 2012 के फैसले और 15 मार्च 2012 को हस्ताक्षरित अवॉर्ड को रद्द कर दिया। अब सभी उपलब्ध साक्ष्यों की नए सिरे से जांच कर मुआवजा तय किया जाएगा।
कोर्ट ने संबंधित भूमि अधिग्रहण न्यायालय को आदेश की प्रति मिलने के चार महीने के भीतर सभी मामलों का फैसला करने को कहा है। छह प्रथम अपीलों का निपटारा कर दिया गया है। हालांकि, इनमें से एक अपील एक प्रतिवादी की मृत्यु के बाद उसके संबंध में पहले ही 12 सितंबर 2022 के आदेश से एबेट हो चुकी थी और उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को रिकॉर्ड पर लाने की जरूरी प्रक्रिया नहीं की गई थी।
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