जिस पैर में अंग्रेजों की गोली लगी, उसी वीर का नाम आज गुमनाम! 1942 के नायक को अब सम्मान का इंतजार
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कुर्था थाना पर तिरंगा फहराने के दौरान अंग्रेजी पुलिस की गोली से घायल हुए स्वतंत्रता सेनानी मलिक वैजुल हक को आज भी सरकारी सम्मान का इंतजार है। उनके वंशजों ने सड़क या स्कूल का नाम उनके नाम पर रखने की मांग की है।


अरवल: आज आज़ादी के 80 साल पूरे हो गगए है, लेकिन अरवल के एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी की कहानी आज भी अपने सम्मान की राह देख रही है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ते हुए गोली तक खाई थी, लेकिन उनकी कहानी बहुत कम लोगो को पता है। यह कहानी है कुर्था प्रखंड के मेदनीपुर बड़हिया गांव निवासी मलिक वैजुल हक की। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर मोर्चा लिया था। आंदोलन के दौरान अंग्रेजी पुलिस की गोली उनके पैर में लगी, लेकिन देश की आजादी का जुनून कम नहीं हुआ।
साल 1942, देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की लहर दौड़ रही थी। बिहार में भी आंदोलनकारियों का जोश चरम पर था। 9 अगस्त 1942 को कुर्था थाना पर इंकलाबियों ने कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया था। इसी दौरान अंग्रेजी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी। गोलीबारी में मलिक वैजुल हक के पैर में गोली लग गई। लेकिन घायल होने के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। आजादी के आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही और अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया।
मलिक वैजुल हक को आंदोलन में शामिल होने के कारण अंग्रेजों ने अलग-अलग मौकों पर जेल भेजा। उन्होंने फुलवारीशरीफ, बक्सर और गया की जेलों में कठिन परिस्थितियों का सामना किया। जेल की यातनाएं भी उनके इरादे को नहीं बदल सकीं। देश की आजादी के लिए उनका संघर्ष जारी रहा।
आज भी अपने गांव में सम्मान का इंतजार
आजादी के आठ दशक बाद भी स्वतंत्रता सेनानी मलिक वैजुल हक की स्मृति को सरकारी स्तर पर अपेक्षित पहचान नहीं मिलने को लेकर उनके वंशजों में नाराजगी है। उनके वंशज मो. नसीमुल हक ने कहा कि जिस आजादी के लिए मलिक वैजुल हक जैसे सेनानियों ने अपना जीवन संघर्ष और बलिदान में लगा दिया, आज उनकी पहचान उनके ही क्षेत्र में गुमनामी के बीच है। उनके नाम पर न तो किसी प्रमुख सड़क का नामकरण हुआ और न ही कोई सरकारी योजना या संस्थान उनके नाम से जुड़ा है। मो. नसीमुल हक ने सरकार से मांग की है कि कुर्था से मेदनीपुर बड़हिया जाने वाली सड़क का नाम मलिक वैजुल हक के नाम पर रखा जाए अथवा मेदनीपुर बड़हिया गांव स्थित विद्यालय का नामकरण उनके नाम पर किया जाए। उन्होंने कहा कि इससे आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और अपने क्षेत्र के वीर स्वतंत्रता सेनानी के योगदान की जानकारी मिल सकेगी।
इतिहास किताबों में नहीं, नामों में भी जिंदा रहना चाहिए
मलिक वैजुल हक का संघर्ष कुर्था क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन के साहस, देशभक्ति और बलिदान की मिसाल है। जरूरत है कि ऐसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियों को संरक्षित कर उन्हें उचित सम्मान दिया जाए, ताकि देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीरों की गाथा नई पीढ़ी तक पहुंच सके।
(अरवल से निशांत मिश्रा की रिपोर्ट)

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