श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पौराणिक कथा: जब अत्याचार के अंत के लिए धरती पर हुआ भगवान श्रीकृष्ण का अवतार
हे कंस! जिस देवकी को तुम इतने प्रेम से विदा करके ले जा रहे हो, उसी की आठवीं संतान तुम्हारे वध का कारण बनेगी।”

Jharkhand... news श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में आधी रात के समय मथुरा की कारागार में हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक दिव्य घटना नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय और अत्याचार के अंत का प्रतीक माना जाता है। उनकी जन्म कथा में कंस का अत्याचार, देवकी-वसुदेव का संघर्ष, भगवान का दिव्य अवतार, यमुना पार करने की अद्भुत घटना और गोकुल में उनके पहुंचने की पूरी कहानी शामिल है। मथुरा में कंस का अत्याचार द्वापर युग में मथुरा नगरी पर राजा उग्रसेन का शासन था। उनका पुत्र कंस अत्यंत शक्तिशाली लेकिन क्रूर और अत्याचारी था। कंस ने अपने ही पिता राजा उग्रसेन को सिंहासन से हटाकर मथुरा की सत्ता अपने हाथ में ले ली। सत्ता प्राप्त करने के बाद कंस का अत्याचार बढ़ता गया। प्रजा उसके नाम से भयभीत रहने लगी। इसी दौरान उसकी बहन देवकी का विवाह यदुवंशी सरदार वसुदेव के साथ तय हुआ। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। विवाह के बाद उसने स्वयं रथ चलाकर देवकी और वसुदेव को उनके घर पहुंचाने का निर्णय लिया। लेकिन रास्ते में अचानक आकाशवाणी हुई— “हे कंस! जिस देवकी को तुम इतने प्रेम से विदा करके ले जा रहे हो, उसी की आठवीं संतान तुम्हारे वध का कारण बनेगी।” आकाशवाणी सुनते ही कंस का चेहरा क्रोध से भर गया। उसने तुरंत देवकी की हत्या करने के लिए तलवार उठा ली। वसुदेव ने कंस को समझाया कि देवकी से तुम्हें कोई खतरा नहीं है। उन्होंने वचन दिया कि देवकी की जो भी संतान होगी, उसे कंस को सौंप दिया जाएगा। कंस ने देवकी की हत्या तो नहीं की, लेकिन उसने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में बंद कर दिया। कंस ने एक-एक करके संतानों की हत्या की समय बीतता गया और देवकी ने संतान को जन्म दिया। वसुदेव ने अपना वचन निभाते हुए नवजात शिशु को कंस को सौंप दिया। कंस ने उस बच्चे की हत्या कर दी। इसके बाद देवकी की प्रत्येक संतान के जन्म के साथ कंस का भय बढ़ता गया। उसने देवकी और वसुदेव की संतानों को एक-एक करके मारना शुरू कर दिया। छह संतानों की हत्या के बाद जब सातवीं संतान का समय आया, तब भगवान की योगमाया की शक्ति से गर्भ में स्थित बालक को देवकी से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया। यही बालक आगे चलकर बलराम के नाम से प्रसिद्ध हुए। अब कंस को देवकी की आठवीं संतान का इंतजार था। उसे विश्वास था कि आठवीं संतान ही उसके विनाश का कारण बनेगी। इसलिए उसने कारागार की सुरक्षा और भी कड़ी कर दी। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार आखिर वह शुभ घड़ी आ गई। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को मथुरा की कारागार में देवकी ने भगवान श्रीकृष्ण को जन्म दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय कारागार में अद्भुत प्रकाश फैल गया। भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के सामने अपने दिव्य चतुर्भुज स्वरूप में दर्शन दिए। भगवान ने कहा कि वे पृथ्वी पर बढ़ रहे अधर्म और अत्याचार का अंत करने के लिए अवतार लेकर आए हैं। उन्होंने वसुदेव को आदेश दिया कि वे उन्हें तत्काल गोकुल ले जाएं और वहां नंद बाबा के घर जन्मी कन्या के साथ उनका आदान-प्रदान कर दें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने सामान्य नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया। अपने आप खुल गए कारागार के द्वार भगवान के जन्म के साथ ही अद्भुत घटनाएं होने लगीं। कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव के हाथों में लगी बेड़ियां खुल गईं और कारागार के भारी दरवाजे अपने आप खुल गए। वसुदेव ने बालक कृष्ण को एक सूप में रखा और उन्हें लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। बाहर तेज बारिश हो रही थी। यमुना नदी उफान पर थी। चारों ओर अंधेरा था, लेकिन वसुदेव ने भगवान के आदेश का पालन करते हुए गोकुल की ओर यात्रा जारी रखी। शेषनाग ने बाल कृष्ण की रक्षा की जब वसुदेव यमुना नदी के बीच पहुंचे, तब नदी का जल काफी बढ़ गया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श होते ही यमुना का जल शांत होने लगा और वसुदेव के लिए मार्ग बन गया। इसी दौरान भगवान शेषनाग ने अपने विशाल फनों को फैलाकर बाल कृष्ण को वर्षा से बचाया। वसुदेव किसी तरह यमुना पार करके गोकुल पहुंचे। नंद के घर पहुंचे बाल कृष्ण गोकुल में उस समय नंद बाबा की पत्नी यशोदा ने भी एक संतान को जन्म दिया था। जन्म के बाद यशोदा गहरी नींद में थीं। वसुदेव ने वहां पहुंचकर बाल कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उनके स्थान पर वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस मथुरा की कारागार में लौट आए। जैसे ही वसुदेव कारागार में पहुंचे, कारागार के दरवाजे फिर से बंद हो गए और उनके हाथों में बेड़ियां लग गईं। कुछ ही समय बाद पहरेदारों को बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने कंस को इसकी सूचना दी। कंस को मिली अंतिम चेतावनी कंस तुरंत कारागार में पहुंचा। उसने देवकी की आठवीं संतान समझकर उस कन्या को उठाया और उसे पत्थर पर पटककर मारने का प्रयास किया। लेकिन वह कन्या उसके हाथ से निकलकर आकाश में पहुंच गई और देवी के रूप में प्रकट हुई। धार्मिक कथा के अनुसार देवी ने कंस से कहा— “हे कंस! जिसे मारने से तुम्हें मुक्ति की उम्मीद थी, वह तो कहीं और जन्म ले चुका है। अब तुम्हारा अंत निश्चित है।” यह सुनकर कंस भयभीत हो गया। उधर गोकुल में नंद बाबा के घर भगवान श्रीकृष्ण का पालन-पोषण शुरू हुआ। माता यशोदा उन्हें अपने पुत्र के रूप में पालने लगीं। बाल कृष्ण की लीलाओं से पूरा गोकुल आनंदित होने लगा। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के अत्याचार का अंत किया और धर्म की स्थापना की। जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अंधकार के बीच प्रकाश के आने का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं। जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं और रात 12 बजे उनके जन्म का उत्सव मनाते हैं। मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। भगवान को झूले में झुलाया जाता है और “नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” जैसे भजनों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा विशेष रूप से की जाती है। कई स्थानों पर दही-हांडी और कृष्ण लीला का आयोजन भी होता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हमें यह संदेश देता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य और धर्म की अंततः विजय होती है।
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