दाखिल-खारिज पर बड़ा सवाल: अपील के बाद भी CO के पास लौट रही फाइलें, म्यूटेशन व्यवस्था पर उठे गंभीर प्रश्न
दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया को लेकर एक मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

Medaninagar Palamu जिले में दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया को लेकर एक मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि अपील के बाद भी कुछ मामलों में भूमि सुधार उपसमाहर्ता (LRDC) द्वारा अंतिम निर्णय देने के बजाय प्रकरण पुनः अंचल अधिकारी (CO) के पास भेजे जा रहे हैं। इससे झारखंड म्यूटेशन अधिनियम के तहत अपीलीय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
उंटारी रोड प्रखंड के मुरमा खुर्द निवासी उपेन्द्र मेहता ने 31 जुलाई 2023 को लगभग पौने छह डिसमिल भूमि खरीदी। 4 अगस्त 2023 को उन्होंने ऑनलाइन दाखिल-खारिज के लिए आवेदन किया, जिसे 9 नवंबर 2023 को तत्कालीन अंचल अधिकारी ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि भूमि विवादित है। इसके विरुद्ध आवेदक ने झारखंड म्यूटेशन अधिनियम की धारा 15 के तहत LRDC के समक्ष अपील दायर की। 16 अक्टूबर 2024 को LRDC ने आदेश पारित किया, जिसके बाद पुनः सुनवाई हुई, लेकिन 23 मार्च 2025 को अंचल अधिकारी ने फिर आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि भूमि की चौहद्दी सही नहीं है तथा दखल-कब्जा सिद्ध नहीं है।
इसके बाद आवेदक ने दोबारा LRDC के समक्ष अपील की। आरोप है कि 16 जुलाई 2025 को LRDC ने स्वयं अंतिम निर्णय देने के बजाय प्रकरण को पुनः अंचल अधिकारी के पास अवलोकन एवं आदेश के लिए भेज दिया। इसी कार्रवाई को लेकर अब कानूनी बहस तेज हो गई है। कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं झारखंड म्यूटेशन अधिनियम की धारा 15(3) में स्पष्ट प्रावधान है कि अपील पर भूमि सुधार उप समाहर्ता (LRDC) द्वारा पारित आदेश अंतिम होगा, जब तक कि अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत उपायुक्त के समक्ष उसका पुनरीक्षण (Revision) नहीं किया जाता। ऐसे में विधि विशेषज्ञों का प्रश्न है कि यदि अपीलीय आदेश अंतिम माना गया है, तो क्या बार-बार मामले को उसी प्राधिकारी के पास भेजना, जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गई थी, अधिनियम की भावना के अनुरूप है? साधना खान मामले का भी दिया जा रहा हवाला इस संदर्भ में झारखंड हाईकोर्ट के Sadhna Khan बनाम State of Jharkhand के निर्णय का भी उल्लेख किया जा रहा है। इस निर्णय में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया कि यदि LRDC द्वारा अंचल अधिकारी के आदेश को निरस्त कर दिया जाता है, तो उस आदेश से असंतुष्ट पक्ष या संबंधित अंचल अधिकारी को धारा 16 के तहत पुनरीक्षण (Revision) का सहारा लेना होगा। यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पुनरीक्षण नहीं किया जाता, तो LRDC के आदेश का अनुपालन किया जाना अपेक्षित है। कानूनी जानकारों का कहना है कि अपीलीय प्राधिकारी का उद्देश्य केवल प्रकरण वापस भेजना नहीं, बल्कि विवाद का प्रभावी और विधिसम्मत निस्तारण करना भी है। यदि अपील के बाद भी मामले बार-बार CO और LRDC के बीच घूमते रहें, तो इससे अपीलीय व्यवस्था का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है तथा नागरिकों को समयबद्ध न्याय मिलने में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। उपेन्द्र मेहता ने अब पलामू उपायुक्त के जन समाधान कार्यक्रम में आवेदन देकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, विधिसम्मत कार्रवाई तथा न्याय दिलाने की मांग की है।
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